मैंने हाल में ही बुलेट खरीदी है डर था कहीं छिन गयी तो, पैसे लूट लिये गये तो, आखिर कौन होगा जो इतने हथियारों के जंगल में भटकेगा. सिमडेगा नक्सल प्रभावित इलाकों में गिना जाता है. कोलेबिरा के जंगलों में इस तरह के व्यक्ति को देखकर रूकना बेवकूफी ही होगी. इतना कुछ सोचते हुए मैं उसकी तरफ बढ़ रहा था. वो भी मुझे अपनी ओर आता देख जंगल की तरफ वापस लौटने लगा था मैंने इशारे से रोका तो वो रूक गया. जैसे – जैसे नजदीक पहुंच रहा था मन शांत होता जा रहा था. चेहरे पर हल्की झुर्रियां, सिर पर नीली टोपी, गले में लाल रंग की माला, हाथ में बलुआ, पीछे तीर – धनुष और दूसरे हाथ में गुलेल.
मन में कुछ पाने की लालच नहीं होती बस हमारी प्रकृति की तरह देना जानते हैं लेना नहीं. रामेश्वर बैठा 21 साल की उम्र से जंगल बचा रहा है. पांरपरिक हथियार लेकर ये घर से निकलते हैं और जंगल- जंगल धूमकर जानवरों की और जगंल की रक्षा करते हैं. उनकी उम्र लगभग 55 साल की है. जिस उम्र में लोग रिटायर्ड होने की सोचते हैं रामेश्वर को वन विभाग ने नौकरी दी है. तीन साल पहले वन विभाग रामेश्वर के जंगल के प्रति समर्पण को समझा और उन्हें 6 हजार रुपये महीने की नौकरी दी.
रामेश्वर कहते हैं मेरा काम घूमना है जंगल- जंगल घूमता हूं लोगों को लकड़ी काटने से रोकता हूं. जानवरों के शिकार करने से रोकता हूं. मुझे खतरा है दोनों तरह से जानवरों से भी और उन चोरों से भी जो जंगल में लकड़ी चोरी करने आते हैं. इसलिए हथियार अपने साथ रखता हूं. रामेश्वर ने मुझे अपना तीर दिखाते हुए कहा, इसे मैंने बनाया है. इसका डिजाइन इस तरह है कि एक बार शरीर के अंदर घूस गया तो किसी को बचना मुश्किल है. तीर का डिजाइन साधारण तीर से अलग था. उसके कोने पर कर्भ था . एक बार तीर शरीर के अंदर चला गया तो उसे सीधा पकड़कर निकालना मुश्किल है क्योंकि अंदर जाकर वो फंस जायेगा. रामेश्वर कहते हैं मैं जंगल में जानवरों को देखता हूं तो किनारे हो जाता हूं. उन्हें नहीं मारता. मैंने जब पूछा कि आपको जंगलों में चोर और जंगली जानवरों के अलावा उग्रवादियों से डर नहीं लगता तो बोले, जंगल बचाने के काम से वो तो और खुश होते हैं. आकर कहते हैं तुम अच्छा काम कर रहो हो.
जंगल में चोरों की कमी नहीं है लेकिन चोर जानने लगे हैं कि रामेश्वर जंगल की रखवाली करता है तो चोरी करने नहीं आते. अगर आते भी हैं तो मुझे दूर से ही देखकर भाग जाते हैं. रामेश्वर को इस जंगल ने बहुत कुछ दिया है. रामेश्वर जंगल से मिली खूबी बताते हुए कहते हैं मैं नागमतिया हूं. किसी को सांप ने काट दिया तो मैं उसका ईलाज कर देता हूं. कई जगहों से लोग मुझसे मिलने आते हैं या मुझे ले जाते हैं. सांप और मेरी दोस्ती है मैं उन्हें गले में लपेट कर घूमता हूं. मैंने जब उनसे पूछा की आप रिटायर्ड कब होंगे. रामेश्वर कहते हैं जब तक शरीर में जान है औऱ जंगल को बचाने की क्षमता है मैं इसी तरह घूमता रहूंगा जिस दिन शरीर जवाब दे देगा रिटायर्ड हो जाऊंगा.
बकैती- जल जंगल जमीन के नाम पर झारखंड में राजनीति कोई नयी बात नहीं है. जगल बचाने के नाम पर विरोध भी नया नहीं है लेकिन असल जननायक देखने हो तो कभी रांची के मोहराबादी मैदान का रुख मत कीजिए. जंगल बचाने वाले असल किरदारों से मिलना हो तो गांव की तरफ बढ़िये, मेरी मुलाकात तो घने जंगलों में इनसे हो गयी. 
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