📅 Tuesday, 18 August 2026
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भोगनाडीह झडप के पीछे की राजनीति :  सिदो कान्हों के बलिदान की नहीं झड़प की खबरें

भोगनाडीह झडप के पीछे की राजनीति : सिदो कान्हों के बलिदान की नहीं झड़प की खबरें

हूल दिवस पर भोगनाडीह में सिदो कान्हों के वंशज और पुलिस के बीच झड़प हुई। इस झड़प ने कई सवाल खड़े किए कि आखिर ये हुआ क्यों ?  19वीं सदी के मध्य में जमीन की लूट, कर वसूली और दमन के खिलाफ आदिवासी समुदाय में असंतोष था, आज ऐसे हालात तो नहीं है शायद की सिदो कान्हों के वंशज और ग्रामीणों को अचानक से विद्रोह करना पड़ा। भोगनाडीह हूल विद्रोह की जमीन है, हूल दिवस के मौके पर इस झड़प की खबर ने क्या इस माटी को बदनाम नहीं किया। सवाल तो यह भी है कि इस झड़प में किसकी छवि खराब हुई।  

झडप के पीछे की रानजीति

कोई भी आंदोलन, विद्रोह किसी एक व्यक्ति के दम पर खड़ा नहीं होता। साधारण जनता इसे मजबूत बनाती है। उन्हें अपने नेता पर भरोसा होता है कि वो उनके लिए लड़ेगा। वक्त बदला है तो नेता भी बदले हैं और राजनीति भी। अब तमाम विरोध, आंदोलन के बाद भी बड़े विद्रोह और आंदोलन कहां है। इसकी सबसे बड़ी वजह है राजनीति का बदलना। भोगनाडीह में जो हुआ सिर्फ छिछली राजनीति के अलावा कुछ नहीं था। सिद्धो-कान्हू के वंशज मंडल मुर्मू भारतीय जनता पार्टी में शामिल है। विधानसभा चुनाव से पहले वह झामुमो में थे और हेमंत सोरेन के प्रस्तावक थे चुकि राजनीति बदली तो बहुत कुछ बदलाव और इस बदलाव को मौजूदा राजनीति हजम नहीं कर सकी।

इसकी तैयारी आज की नही है 3 जून को सिद्धो-कान्हू हिल फाउंडेशन और आतु मांझी वैसी ने अनुमंडल पदाधिकारी को चिट्ठी दी और कार्यक्रम की अनुमति मांगी। मुख्य अतिथि चंपाई सोरेन और विशिष्ट अतिथि लोबिन हेम्ब्रम। 23 जून को अनुमंडल पदाधिकारी ने मुख्यमंत्री की मौजूदगी में सरकारी कार्यक्रम और संभावित भीड़ का हवाला देकर कार्यक्रम की परमिशन नहीं दी । विवाद शुरू हुआ मामला परिजनों के श्रद्धांजलि अर्पित करने, पूजा पाठ करने तक गये, 4 दिन से विवाद चला रहा था. रविवार को भोगनाडीह के ग्रामीणों और पुलिस प्रशासन के बीच खींचतान  हुई और अंतत:  ग्रामीणों की तरफ से तीर धनूष और पुलिस की तरफ से आंसू गैस के गोले छोड़े गए। जिस माटी पर खड़े होकर हूल विद्रोह को याद करना था, वही जगह जंग का मैदान बन गई।

भविष्य क्या होगा। अगर मामला पूरी तरह राजनीतिक है तो इसका हल क्या निकलेगा। इस बार तो सीएम मौजूद नहीं थे अगले साल मौजूद रहेंगे अगर तब तक राजनीतिक परिस्थितियां नहीं बदली तो और क्या- क्या बदलेगा। क्या यह परिस्थिति एक साल बाद ही आयेगी या इस खींचतान का असर इलाके में भी दिखने लगेगा। राज्य और केंद्र की सरकारी योजनाएं इन इलाकों में कितनी प्रभावी हैं, क्या योजनाओं को लेकर भी खींचतान होगा। इसकी चिंता कौन करेगा कि भोगनाडीह का भविष्य क्या है। हूल दिवस जिसकी पहचान राष्ट्रीय स्तर पर होनी चाहिए वहां पुलिस और ग्रामीण के बीच के झड़प की खबर सुर्खियां बटोर रही है।

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