📅 Saturday, 18 July 2026
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राजनीति में न उम्र की सीमा, न रिटायरमेंट…

राजनीति में न उम्र की सीमा, न रिटायरमेंट…

जब आप किसी सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करते हैं, तो सबसे पहले जिस चीज़ पर ध्यान जाता है वह है उम्र सीमा। केंद्र और राज्य सरकार की लगभग हर नौकरी के लिए एक तय आयु सीमा होती है। इतना ही नहीं, सरकारी कर्मचारियों के लिए रिटायरमेंट की उम्र भी निर्धारित है,आमतौर पर 60 साल।

ऐसे में एक साधारण सवाल उठता है,क्या आप 50 साल की उम्र में किसी सरकारी नौकरी के लिए आवेदन कर सकते हैं?

पहली नजर में यह सवाल साधारण लग सकता है, लेकिन इसके भीतर ही देश की राजनीति से जुड़े कई सवाल छिपे हैं। हम जैसे सामान्य लोग, जो अपनी मेहनत और संघर्ष के दम पर जीवन में आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं, उनके लिए नियम और सीमाएं तय हैं। हमें इन रास्तों पर चलने के लिए कोई विशेष सहारा नहीं मिलता।

हममें से कई लोग ऐसे होते हैं जिनके जीवन में आर्थिक, मानसिक या स्वास्थ्य से जुड़ी कई तरह की समस्याएं होती हैं। कई बार परिवार से भी वह सहयोग नहीं मिलता जिसकी जरूरत होती है। इन परिस्थितियों में जो क्षमता और मेहनत हम दिखा सकते थे, वह भी कई बार अधूरी रह जाती है।

लेकिन राजनीति की दुनिया में तस्वीर कुछ अलग है। बिहार में मुख्यमंत्री के बेटे निशांत 50 वर्ष से अधिक की उम्र में राजनीति में सक्रिय हुए हैं। वहीं बिहार के एक पूर्व मुख्यमंत्री के चार बच्चे पहले से ही राजनीति में सक्रिय हैं।

जिन लोगों को जीवन में आर्थिक संघर्ष का सामना नहीं करना पड़ा, वे न तो डॉक्टर बन पाए, न इंजीनियर, न खिलाड़ी और न ही किसी अन्य क्षेत्र में विशेष पहचान बना सके। लेकिन पारिवारिक पृष्ठभूमि के सहारे राजनीति में प्रवेश करते ही उनके लिए सत्ता के दरवाजे खुल जाते हैं।

कमाल तो तब होता है जब पार्टी में आते ही किसी को उपमुख्यमंत्री बना दिया जाता है, कोई स्वास्थ्य मंत्री बन जाता है, तो किसी को महत्वपूर्ण मंत्रालय की जिम्मेदारी मिल जाती है।

सोशल मीडिया और खबरों में अक्सर इनकी तारीफों के पुल बांधे जाते हैं। लेकिन सवाल उठता है कि इनकी व्यक्तिगत उपलब्धि आखिर क्या है? क्या उनका सबसे बड़ा हासिल सिर्फ इतना है कि उनके पिता ने अपने संघर्ष और मेहनत से राजनीति में एक स्थान बनाया और अब उसी रास्ते पर चलते हुए उनके बच्चे सत्ता के शीर्ष तक पहुंच गए?

कुछ लोग तर्क देते हैं कि पिता के संघर्ष का फल बेटे को ही मिलेगा। यह बात एक पारिवारिक व्यवसाय में सही हो सकती है.जैसे कपड़ों की दुकान, मिठाई की दुकान या कोई निजी कारोबार। लेकिन राजनीति कोई पारिवारिक दुकान नहीं है। यह राज्य और देश के भविष्य से जुड़ा विषय है।

ऐसे में सिर्फ पारिवारिक पहचान के आधार पर किसी को सत्ता की जिम्मेदारी सौंपना क्या लोकतंत्र की भावना के अनुरूप है?

दरअसल, राजनीति में ऐसे उदाहरण सिर्फ एक राज्य तक सीमित नहीं हैं। देश के कई हिस्सों में यह प्रवृत्ति दिखाई देती है। कई ऐसे लोग भी हैं जिन्हें राजनीति तो दूर, सार्वजनिक मंच पर ठीक से बोलना भी नहीं आता, लेकिन पद और प्रतिष्ठा उनके पास होती है।

राजनीति शायद देश का एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जहां 50 साल का व्यक्ति “युवा नेता” कहलाता है और 80 साल की उम्र में भी लोग सक्रिय राजनीति में बने रहते हैं।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है, क्या राजनीति में प्रवेश की कोई न्यूनतम और अधिकतम आयु नहीं होनी चाहिए? क्या राजनीति में भी रिटायरमेंट की कोई व्यवस्था नहीं होनी चाहिए?

यह सवाल किसी एक पार्टी या व्यक्ति का नहीं है। लोकतंत्र में नेताओं को चुनने वाले आखिरकार हम ही लोग हैं। इसलिए शायद अब समय आ गया है कि इस विषय पर समाज और व्यवस्था दोनों को गंभीरता से विचार करना चाहिए।

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