
संकोच बहुत कमाल की चीज है। कमाल इसलिए कि आप यह तय नहीं कर पाते कि सच में करना क्या है, तो संकोच कर लेते हैं। यह कमाल की चीज आपको कई चीजों से दूर करती है। आसानी से यह आपका पीछा भी नहीं छोड़ती और जीवन भर आपकी ऊंगली थामे आपके साथ सफर करती है। कभी- कभी संकोच बड़ी होती तो कभी छोटी, यह निर्भर करता है कि वक्त के साथ- साथ आप कितना सफर तय कर चुके हैं । आज इस लेख में बात करेंगे संकोच के साथ अब तक के सफर की..
इससे पहले कि आप संकोच में यह आर्टिकल पढ़ना शुरू करें. पहले इसका मतलब समझ लीजिए.. संकोच का शाब्दिक अर्थ हिचकिचाहट, शर्म, लाज, झिझक या डर के कारण कुछ करने या बोलने में रुक जाना होता है। यह वह मानसिक स्थिति है जब व्यक्ति दुविधा या अविश्वास के कारण निर्णय लेने में देरी करता है।
अब समझिए इसकी शुरूआत कहां से होती है ? जैसे आप बोलना सीखते हैं, खुद की इच्छा विकसित कर लेते हैं वैसे ही यह आपके साथ आकर चिपक जाता है। बचपन में किसी खिलौने की चाहत हो, कुछ खाने की इच्छा हो, किसी कपड़े का शौक हो, आप अपने मां- बाप से बोलने में संकोच करते हैं यह सोचते हैं पता नहीं डांट ना पड़ जाए, अगर नहीं मिला तो…
बस, तो यह आपके साथ इस वक्त से जो सफर शुरू करता है. वह आजीवन आपके साथ रहता है। यह निर्भऱ करता है कि आपने अपने जीवन में कितनी जगह दी है। अगर आप इसके साथ बड़े होते रहे. तो आपने स्कूल में सवाल पूछने में संकोच किया ? 10वीं के बाद अपने मनपसंद के विषय चुनने में संकोच किया ? बेहतर करियर चुनने में संकोच किया ? सच पूछिए तो आपने अपनी मर्जी के जीवन जीने में संकोच किया।
अब आप समझ गये होंगे कि संकोच और आपके बीच का रिश्ता क्या है कितना है।
अब मेरा रिश्ता समझिए.. पत्रकारिता में 13 साल से अधिक के सफर के बाद मेरे और इसके रिश्ते में बहुत खटास आई। मैंने लगभग हर वो काम किया जिसमें मुझे संकोच थी। पहली बार कैमरे पर आने में संकोच था, सवाल पूछने में संकोच था, भीड़ में खड़ा होने से डर लगता था, बोलने से डर लगता था मैंने इसे कई बार मात दी लेकिन कुछ महीनों से ऐसा लग रहा है जैसे वह फिर हावी हो रहा है। पेशा बदलने से इसके साथ रिश्ता भी बदलने लगता है। पेशा नया है तो संकोच के साथ मेरा रिश्ता भी नया है। संकोच और आत्मविश्वास की दुश्मनी अमेरिका और इरान वाली है, हां आत्मविश्वास के पास परमाणु ताकत है और संकोच के पास नहीं। आपका आत्मविश्वास हमेशा इसे मात दे सकता है लेकिन जहा भी कमजोर हुआ तो संकोच आपके अंदर बहुत कुछ खत्म कर देता है।
कुल मिलाकर बात यह है कि आप जिस खेल में माहिर है, उसमें तो हैं ही लेकिन हर बार जब जीवन एक नये खेल में आपकी परीक्षा लेता है, तो सबसे पहला हमला संकोच ही करता है। बस धीरे- धीरे समय के साथ इसे आत्मविश्वास के साथ लड़ते रहेंगे, तो जीत आपकी होगी। यह लड़ाई एक दिन की नहीं है यह लंबी चलती है । जब भी आप जीवन की किसी ऐसी परिस्थिति में हों, जहां संकोच हावी होने लगे तो आंख बंद कीजिए और ध्यान से मौन होकर सोचिए कि आपको क्या करना चाहिए। उस वक्त सीधे आपकी बात आत्मविश्वास से होगी और जो फैसला होगा वह संकोच में लिया गया फैसला नहीं होगा।
एक परिस्थिति देता हूं-
मान लीजिए आप अपने जीवन में जिससे सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, वो आपके आसपास है। उस व्यक्ति ने आपके जीवन में गहरा प्रभाव डाला है वो फिल्म अभिनेता, लेखक या कोई भी बड़ा सफल व्यक्ति हो सकता है। आप क्या करेंगे
क – फट से जाकर उनसे मिल लेंगे
ख- थोड़ा समय लेगे, सोचेंगे
हां कुछ लोग मैंने देखे हैं वो जहा भी संकोच नहीं करते, कई बार बिल्कुल असहज स्थिति में होने के बावजूद भी संकोच नहीं होता। ऐसे लोग अपनी खूब तारीफ करते हैं, अति आत्मविश्वासी, दुस्साहसी होते हैं। मैंने 13 साल से संकोच से दूरी बनाये रखी लेकिन आत्मविश्वास को इतना हावी नहीं होने दिया कि उसने मुझे दुस्साहसी बना दिया। संकोच के साथ अपने रिश्ते को मजबूत नहीं करना औऱ पूरी तरह खत्म भी नहीं करना है। इसे आत्मविश्वास के साथ थोड़ा बचाकर रखना अच्छा होता है हां मेरे साथ इसने अपनी नजदीकी कुछ सालों में बढ़ा ली है। बस धीरे- धीरे इससे पार पाना है।

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