
क्या धुरंधर एक प्रोपगेंडा फिल्म है ? अगर हां तो प्रोपगेंडा होता क्या है, गूगल पर अर्थ तलाशेंगे तो प्रोपगेंडा का अर्थ दुष्प्रचार, अधिप्रचार, प्रचार या विचारधारा का प्रसार होता।
अब सवाल है कि क्या सफल फिल्में ही प्रोपगेंडा की श्रेणी में आती हैं ?
जवाब तलाशते हैं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर फिल्म बनी विवेक ओबराय वाली, योगी के नाम पर बनी। इंमरजेंसी और इंदिरा गांधी के कार्यकाल को दिखाती कई फिल्म बनी। राजनीतिक पर केंद्रित कई फिल्में क्या वो सभी प्रोपगेंडा फिल्म है। अगर कोई फिल्म चलती ही नहीं, या उतनी भी कमाई नहीं कर पाती जितने में वो बनी है तो क्या हो प्रोपगेंडा फिल्म होती है ?
फिल्म में अगर किसी मुसलमान को दिखाना है तो उसका पहनावा कैसा होगा ? ब्राह्मण को दिखाना हो तो कैसा होगा, फिल्म छोड़िए कई कहानियों में भी अपना पढ़ा होगा एक गरीब ब्राह्मण था, क्यों हमेशा ब्राह्मण और किसी सिख व्यक्ति को दिखना हो तो कैसा होगा मजाकिया, मसखरा ना… ये सब तो हम देख ही रहे हैं..
कल धुरंधर 2 देखी फिल्म ने कमाई में 300 करोड़ के आंकड़े को पार कर लिया। मतलब साफ है कि फिल्म बेहद सफल रही है। सवाल उसकी कमाई पर नहीं है। फिल्म पर है, फिल्म में भयंकर विचलित करने वाले दृश्य हैं, भाषा भी कई जगहों पर सड़क वाली है लेकिन फिल्म की कमाई का आंकड़ा बता रहा है कि जनता का मिजाज क्या है। पिछले कुछ सालों में जैसी फिल्में लोगों को पसंद आ रही है उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सड़क छाप भाषा और हिंसा वाली फिल्मों का बाजार अब छोटा नहीं है। रणवीर कपूर की एनिमल ने नई बहस छेड़ी तो अब रणबीर की धूरंधर ने उस बहस को थोड़ा आगे बढ़ा दिया है।
कुल मिलाकर सवाल यह है कि फिल्म कैसी है, व्यक्तिगत तौर पर मुझसे पूछेंगे तो फिल्म मुझे पसंद आई। सोशल मीडिया पर चर्चा है कि फिल्म एक खास सोच को, एक खास नैरेटिव को आगे बढ़ाती है। स्पष्ट शब्दों में कहे तो यह भाजपा का प्रचार करने वाली फिल्म है। बात किसी धर्म, जाति, समुदाय या फिर राजनीतिक विचारधारा की नहीं है फिल्म अपनी बात रखती है आपकी सहमति और असहमति आप अपने साथ रख सकते हैं उसे सोशल मीडिया पर साझा भी कर सकते हैं।
आप किसी भी भाषा की कोई भी फिल्म उठा लीजिए आप यह नहीं कह सकते कि आप उस फिल्म से पूरी तरह सहमत हैं। हर फिल्म में रचनात्मकता ( क्रिएटिविटी) के लिए थोड़ी बहुत छूट मिलती है। जब हीरो एक गोली से दो दुश्मनों को मार देता है तब तो आप नहीं कहते कि यह गलत है या फिर एक व्यक्ति 10 या 12 लोगों को अकेला मार रहा होता है तब भी आप सवाल तो नहीं करते कि यह कैसे। आप मजे ले रहे होते हैं।
जब फिल्म शुरू होती है तो उससे पहले यह साफ कहा गया है कि यह डॉक्यूमेंट्री नहीं है। इस डॉक्यूमेंट्री या सच मानकर मत देखिए। मनोरंजन के लिए देखिए हां यह फिल्म कई असल किरदारों के ईर्द- गिर्द घूमती है लेकिन फिल्म में कहीं भी इसके सच होने का दावा नहीं किया गया है।
फिल्म क्रेडिट टाइटल खत्म होने तक आपको रोके रखती है। फिल्म लंबी है लेकिन कभी लगता ही नहीं है कि यह खत्म हो गई। जब आप अपनी सीट छोड़ रहे होते हैं तब भी लगता है कि अभी कुछ और बचा है। दाऊद, इब्राहिम ( बड़े साहब) , मेजर इकबाल ( आईएसआई) . उज्जैर बलोच, जमील जमाली सरीखे कई किरदार आपको असल में दिखेंगे। इंटरनेट पर रिसर्च करेंगे तो कई और फैक्ट सामने आयेंगे। फिल्म की कहानी के इतर इंटरनेट पर आप इनसे जुड़ी कई कहानियां पढ़ सकते हैं मतलब यह है कि इस फिल्म के किरदार से जुड़े कई नामों की कहानियां पढ़कर आप सच और क्रिएटिविटी का अंदाजा लगा सकते हैं।

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