
पलामू का किला जहां आज भी खजाना छिपे होने की बात आती है। ग्रामीण बताते हैं कि कई लोग इन जगहों से खजाना खोद कर ले गये। वंशजों का कहना है कि उन्हें इसके रास्ते और खजाने का पता मालूम है । राजा के वंशज आज भी साल में कई बार यहां जमा होते हैं। पुराने दस्तावेज, पुरखों से जुड़ी कई कहानियां इनके पास छिपी है। इनमें से कई दावा करते हैं उन्हें खजाने का पता मालूम है साथ ही यह भी चेतावनी देते हैं कि अगर किसने उस खजाने को हाथ भी लगाया तो लेने वाला नष्ट हो जायेगा। इन सब दावों के बीच आज भी पलामू का किला खंडहर हो रहा है। मेरी पलामू किले की पहली यात्रा 11 साल पहले हुई थी मैंने इसका वीडियो बनाकर यूट्यूब पर अपलोड किया था। मैं और मेरा मित्र विकास हम पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे थे। इसी दौरान हमने इस किले का एक विस्तार से वीडियो बनाकर अपलोड किया था। इस बार जब हम किले में पहुंचे तो हालात पहले से ज्यादा खराब थे। इन 11 सालों में मुझे बहुत कुछ बदलाव तो नहीं दिखा हां पर्यटन विभाग और स्थानीय प्रशासन ने थोड़ा बहुत काम किया लेकिन अब भी इस किले के ढह जाने या यूं कहें विरासत के पूरी तरह खत्म हो जाने का खतरा बरकरार है।
खजाने का राज
यह किला अब भी अपने अंदर कई राज छिपाए हुए है। चेऱो राजाओं ने युद्ध और कर से भारी संपत्ति जमा की थी, मुगलों और अंग्रेजों के हमले के समय सोना-चांदी किले में छिपा दिया था। मान्यता है कि आज भी किले के अंदर खजाना है । कुछ लोग मानते हैं कि खजाना आज भी भूमिगत सुरंगों या तहखानों में छिपा है। यहां कभी इस तरह खजाने की खोज हुई ही नहीं। ASI या सरकार ने किसी खजाने की पुष्टि नहीं की। स्थानीय लोगों के पास किले से जुड़ी कई कहानियां है जैसे आज भी किले के अंदर कोई है जो खजाने की रक्षा करता है। रात में उसकी आवाज सुनाई देती है। किले के अंदर एक पूजा स्थल है जहां राजा के वंशज आज भी पूजा करते हैं जब उनसे खजाने पर सवाल किया गया तो उन्होंने संकेत दिया कि जिस जगह आप खड़े हैं वहां हम ऐसे ही पूजा नहीं करते यह पवित्र जगह है।
किले की कहानी
मुगलों ने बार‑बार पलामू पर आक्रमण किया (जहाँगीर–औरंगज़ेब काल में)। 1660 के आसपास मुगल सेनापति दाऊद खान ने किला कब्जा किया, लेकिन मेदिनी राय ने फिर से राज्य वापस लिया। 18वीं सदी में अंग्रेजों ने इस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। । इस किले को झारखंड के सबसे ऐतिहासिक और रहस्यमय किलों में से एक माना जाता है। किला घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच है। इतिहासकार मानते है कि पुराना किला मूल रूप से रकसेल (Raksel) राजवंश द्वारा बनवाया गया था। बाद में इसे चेरो साम्रराज्य Chero Dynasty Rule in Palamu के प्रसिद्ध शासक राजा मेदिनी राय ने मजबूत सैन्य किले के रूप में विकसित किया। राजा मेदिनी राय चेऱो वंश के सबसे शक्तिशाली शासकों में एक थे। उनका शासन लगभग 1658–1674 के बीच रहा। कहा जाता है कि उनके शासनकाल में जनता इतनी समृद्ध थे धनी लोगों के घरों में सोने के बर्तनों में भोजन होता था।
राजा के वंशज कहां है
प्रमुख शासक, भगवत राय (संस्थापक माने जाते हैं), अनंत राय, सहबल राय, प्रताप राय, भूपाल राय, मेदिनी राय (सबसे महान शासक)अंत में चुरामन राय। चेरो वंश एक प्रमुख आदिवासी/स्थानीय राजवंश था, जिसने लगभग 12वीं शताब्दी से 18वीं शताब्दी तक बिहार–झारखंड क्षेत्र में शासन किया। पाल वंश के बाद चेरो जैसे जनजातीय राज्यों का उदय हुआ। इन्होंने शाहाबाद, बनारस, सारण, मुजफ्फरपुर और पलामू जैसे क्षेत्रों में अपना प्रभाव स्थापित किया। पलामू क्षेत्र में चेरो शासन की मजबूत नींव लगभग 1613 ई. के आसपास मानी जाती है। आज चेरो लोग एक जनजातीय/पिछड़ा समुदाय के रूप में झारखंड, बिहार और यूपी में पाए जाते हैं। झारखंड में इन्हें अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा मिला है। ऐतिहासिक रूप से राजा → जमींदार → किसान → मजदूर तक का सामाजिक परिवर्तन हुआ है। आज भी पलामू और आसपास के क्षेत्रों में इनके वंशज रहते हैं और अपनी परंपराओं को जीवित रखते हैं। अपनी इस यात्रा के दौरान मेरी मुलाकात इनके वंशजों से हुई। उन्होंने किले की रक्षा के लिए एक संगठन बनाया है। राजा से जुड़े वंशजों को एकजुट करने में लगे हैं साथ ही अपनी जड़ों की भी तलाश कर रहे हैं। साल में कई बार इनके वंशज इस किले में जमा होते हैं, अपनी विरासत को याद करते हैं और इसके संरक्षण के लिए चर्चा करते हैं।
एक रिपोर्ट बताती है कि किले को संरक्षित करने इसे एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए लगभग 40–50 करोड़ रुपये की बहाली योजना तैयार हुई। ASI और अन्य एजेंसियों की तकनीकी समीक्षा चल रही है। इसमें कितना समय लगेगा। मौजूदा स्थिति क्या है इसे लेकर कोई जानकारी नहीं है।

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