📅 Wednesday, 3 June 2026
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क्या आप भी मुस्लिमों की दुकान से सामान नहीं खरीदेंगे ?

क्या आप भी मुस्लिमों की दुकान से सामान नहीं खरीदेंगे ?

क्या आप भी मुस्लिमों की दुकान से सामान नहीं खरीदेंगें ? आपका जवाब हां में हो या ना मैं.  यह आपकी सोच पर निर्भर करता है आपकी जाति या धर्म पर नहीं. अगर आपको लगता है कि यह आपकी जाति या धर्म पर निर्भर करता है, तो हिंदू होते हुए जरा मुस्लिम होकर सोच लीजिए और मुस्लिम हैं तो हिंदू होकर. सीधे कहूं तो जरा इंसान होकर सोच लीजिए ना थोड़ी देर के लिए केसरिया या हरे रंग का चश्मा उतार लीजिए फिर सोचिये. अब बताइये मुस्लिम या हिंदू फल दुकान नाम में क्या रखा है ? 

पहले घटना समझिये हुआ क्या था
सोशल मीडिया पर फैले अफवाह की वजह से फल की बिक्री पर असर पड़ा.  जमशेदपुर में एक फल विक्रेता ने लोगों के मन में बैठे डर का बखूबी समझा और बैनर लगा दिया. बैनर किसी नाम का नहीं था. बहुत सारे दुकानदार अपने बच्चों के नाम से, अपने नाम से, माता-पिता के नाम से दुकान में बैनर लगाते है. नाम से धर्म का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है. अगर साधारण नाम होता तो शायद विवाद भी नहीं होता. विवाद का कारण था  “विश्व हिंदू परिषद से अनुमोदित ” हिंदू फल दुकान की मंशा जाहिर थी. उन्होंने ना सिर्फ धर्म के आधार पर दुकान का नाम रखा बल्कि वीएचपी से सर्टिफिकेट भी ले लिया. बात सिर्फ एक दुकान के नाम रखने की नहीं थी बात राजनीतिक थी तो राजनीति होनी ही थी हो रही है. 
राजनीति समझिये, किसी खेमे का हिस्सा मत बनिये
सोशल मीडिया पर दुकान की तस्वीर के साथ कुछ मुस्लिम होटल के नाम की तस्वीर शेयर हो रही है. पूछा जा रहा यह सही तो यह सही क्यों नहीं ?  क्या सच में जवाब आपके पास नहीं है ? क्या सच में यह गंभीर मसला है, पक्षपात हो रहा  है ? क्या इस देश में हिंदू होटल नाम की कोई होटल नहीं है, क्या इस देश में हिंदुओं के नाम के फल दुकान नहीं है. अगर हैं तो फिर यह बेतूका उदाहरण और सवाल कयों ?  
कुछ और सवाल हैं यकीन मानिये बेतूके नहीं है जरा जवाब हो तो दीजिएगा ? 
क्या फल, सब्जी, दुध, कपड़े, मांस – मछली, घर के जरूरी सामान हिंदू और मुस्लिम हो सकते हैं. अगर हो सकते हैं तो कैसे ?  क्या सिर्फ इस आधार पर कि वह मुस्लिम फल दुकान से खरीदे गये la मुस्लिम हो गये या हिंदू फल दुकान से खरीदे गये तो हिंदू हो गये. उसकी बीज कहां से खरीदी गयी,बीज जिस जमीन पर लगी वह हिंदू की थी या मुस्लिम की जब फसल तैयार हुई तो उसे काटने वाले कौन थे, बाजार तब पहुंचाने वाले कौन थे. छोटी दुकान तक पहुंचाने वाले उन्हें बेचने वाले खरीदने वाले कौन थे ये लोग हिंदू थे या मुस्लिम सब पता कर पायेंगे? कर पायेंगे तो तरीका बताइयेगा फिर बैठकर बंटवारा करेंगे कौन हिंदू कौन मुस्लिम. 
अफवाह कौन फैलाता है, डर हममें कैसे बैठ जाता है 
एक बड़े राजनेता को टक्कर देने वाले एक निर्दलीय  नेता चुनाव लड़े थे. उनके सोशल साइट पर मैंने एक वीडियो देखा जिसमें दाढ़ी रखे एक फल विक्रेता फलों को चाटता दिखाया गया था. एक और वीडियो जिसमें नोट पर थूक लगाते हुए दिखाया गया था बताया गया कि सतर्क रहिये. जरा सोचिये लोगों के मन में कैसा प्रभाव पड़ेगा अब आप कहेंगे वीडियो तो वीडियो है सच तो दिख रहा है. टिक टॉक जैसे ऐप पर लाइक और शेयर पाने के लिए बनाया गया वीडियो वायरल था दोनों की गिरफ्तारी हो चुकी थी और दोनों ने कहा कि हमने वायरल होने के लिए किया जरा सोचिये कौन इस तरह की हरकत करते हुए वीडियो बनाना चाहेगा, या सड़क पर ऐसी हरकत करेगा ? 
मेरे दो वरिष्ठ साथी हैं दोनों ने बातचीत में बताया कि हिंदू मांस- मछली बेचने वालों की दुकान पर खूब भीड़ हो रही है. एक तो अब चिकन के साथ- साथ मटन, अंडे और मछली भी बेचने लगा है लोग पूरे विश्वास के साथ खरीदते हैं. भले ही अंडे कहीं से आते हों, मछली कहीं से आती हो लेकिन यहां से खरीद रहे  हैं तो सब शुद्ध मिल रहा है… 
असर क्या होगा 
पहले तय कर लीजिए कि क्या चौराहे पर मुस्लिम दुकान से सामान नहीं खरीदना या पूरे देश को मुस्लिम देशों का भी बहिष्कार करना है ? अगर आप भयंकर नाराज हैं तो कहेंगे मुस्लिम देशों का भी बहिष्कार करेंगे ठीक है , पेट्रोल – डीजल के कम इस्तेमाल की आदत डालिये, सुना है तेल मुस्लिम देशों से ही आता है. अरे जाइये एक चीन के सामान का तो बहिष्कार किया गया नहीं गया आपसे मुस्लिम देशों का घंटा कर पायेंगे. इतना समझिये कि इससे नेता और हिंदू- मुस्लिम दोनों से आने वाले उच्च वर्ग के लोगों पर कोई असर नहीं होगा असर होगा हम पर और आप पर जो आम और साधारण लोग है. जरा सोचिये कि क्या आप इस देश में 15 करोड़ लोगों को अलग-थलग आजीविकाविहीन करके जी पाएंगे?
  

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