
राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग का खेल कैसे होता है ? पूरी प्रक्रिया क्या है, कब वोट रद्द हो सकता है ? उद्योगपति क्यों करते हैं राज्यसभा का रुख ? परिमल नाथवानी क्यों कर रहे हैं जीत का दावा जब आंकड़े नहीं है ? झारखंड में राज्यसभा चुनाव का इतिहास क्या इशारा कर रहा है ? आइये तलाशते हैं इन सारे सवालों के जवाब…
झारखंड में 18 जून को मतदान होना है और यह सबकुछ इतना आसान नहीं है। राज्यसभा के नामांकन के वक्त ही यह साफ हो गया कि यह चुनाव भी झारखंड के राजनीतिक इतिहास में अपना स्थान बनायेगा। राज्यसभा को उच्च सदन कहा जाता है, अगर लोकसभा ‘जनता की आकांक्षाओं’ का प्रतीक है तो राज्यसभा ‘राज्यों के अधिकारों’ और ‘देश की बुद्धिमत्ता’ का रक्षक है। राज्यसभा में ऐसे उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी जाती है जो कला , साहित्य, विज्ञान, समाज सेवा, खेल से जुड़े हों। राष्ट्रपति ऐसे 12 लोगों का चयन करते हैं। दशकों में यह सदन धीरे-धीरे राजनीति और पैसे के खेला का अखाड़ा हो गया।
आंकड़े बता रहे हैं कहानी
ADR (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स) के आंकड़े बताते हैं कि 2013 में एक औसत राज्यसभा सांसद की घोषित संपत्ति करीब 20 करोड़ थी। मार्च 2026 तक यह औसत छह गुना बढ़कर 120.69 करोड़ प्रति सांसद तक पहुंच गई। राज्यसभा के 31 सांसद यानी करीब 14% सांसद अरबपति हैं, इनके पास पास 100 करोड़ से अधिक संपत्ति है। राज्यसभा के 42 फीसदी सांसद करोड़पति की श्रेणी में आते हैं। यह आंकड़ा महज संयोग नहीं है यह राज्यसभा के महत्व और जीत के असल कारणों को समझने में बेहद मदद करते हैं। साल 2003 से पहले यह नियम था कि व्यक्ति जिस राज्य से राज्यसभा जाना चाहता है, वहीं का वोटर होना चाहिए। लेकिन 2003 के संशोधन के बाद देश का कोई भी योग्य नागरिक किसी भी राज्य से राज्यसभा का चुनाव लड़ सकता है। इस फैसले के बाद राज्यसभा के चुनाव का स्वरूप बदला।
झारखंड़ का हाल
राज्यसभा चुनाव में झारखंड का इतिहास बेहद रोचक रहा है। इस बार भी मुकाबला बेहद रोचक है। बैद्यनाथ राम को झामुमो (JMM) ने उम्मीदवार बनाया है। जेएमएम दूसरी सीट पर भी अपना उम्मीदवार उतारने के फिराक में थी लेकिन कांग्रेस ने जेएमएम को किसी तरह मना लिया। दूसरे उम्मीदवार के रूप में कांग्रेस ने प्रणव झा का नाम आगे रखा। भाजपा कई नामों पर चर्चा कर रही थी जिसमें कई हारे हुए पुराने नेता, एक महिला ब्यूरोक्रेट्स की चर्चा थी लेकिन अब परिमल नाथवाणी- निर्दलीय उम्मीदवार के साथ खड़ी है।
पहले संख्या बल समझिए फिर परिमल नाथवाणीको और बेहतर ढंग से समझेंगे अभी सत्तारूढ़ गठबंधन (JMM + कांग्रेस) के पास 56 विधायक हैं। आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि बेद्यनाथ राम और प्रणव झा की जीत पक्की है लेकिन झारखंड में हुए राज्यसभा चुनाव का इतिहास हर बार इन आंकड़े के इतर अलग कहानी लिखने के लिए बेताब रहा है एनडीए (NDA) ने केवल 24 विधायकों के बावजूद ना सिर्फ दिग्गज कारोबारी परिमल नाथवाणी के साथ है बल्कि जीत का दावा भी कर रही है। परिमल नाथवाणी को जीतने के लिए 4 अतिरिक्त वोटों की जरूरत है। इन सबके बीच झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) के विधायक जयराम महतो को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
आंकड़े जो तय करेंगे हार- जीत
सत्तारूढ़ गठबंधन (INDIA ब्लॉक) – कुल 56 वोट: झामुमो (JMM): 34 विधायक, कांग्रेस: 16 विधायक, राजद (RJD): 4 विधायक, माले (CPI-ML): 2 विधायक
विपक्ष (NDA ब्लॉक) – कुल 24 वोट: भाजपा (BJP): 21 विधायक,आजसू (AJSU): 1 विधायक,जदयू (JD-U): 1 विधायक, लोजपा-आरवी (LJP-RV): 1 विधायक
अन्य: झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) के पास 1 विधायक (जयराम महतो) हैं।
झारखंड में राज्यसभा चुनाव का वो काला इतिहास
राज्यसभा चुनाव के नामांकन में कांग्रेस ने जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। परिमल नाथवाणी के नामांकन पत्र में गड़बड़ी का आरोप लगा। नाम को लेकर सवाल हुए, कंपनी छिपाने का आरोप लगा। कांग्रेस की तरफ से पैरवी के लिए सलमान खुर्शीद झारखंड में थे इसके बावजूद रिटर्निंग ऑफिसर ने जांच के बाद नाथवाणी के नामांकन को वैध करार दिया। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि विधानसभा में पैसे बांटे गये कर्मचारियों को पांच- पांच सौ रूपए मिले हैं।
क्रॉस वोटिंग का डर: आंकड़ों की इस रस्साकशी के बीच सत्तारूढ़ गठबंधन को फिर से क्रॉस वोटिंग और हॉर्स-ट्रेडिंग का डर सता रहा है। ये डर जायज भी है।
वर्ष 2010 का चुनाव: ‘कैश फॉर वोट’ स्टिंग ऑपरेशन
क्या हुआ था?: साल 2010 के राज्यसभा चुनाव के दौरान एक न्यूज चैनल ने स्टिंग ऑपरेशन किया था। इसमें कई पार्टियों के विधायक कैमरे पर एक खास उम्मीदवार को वोट (क्रॉस वोटिंग) देने के एवज में पैसे की मांग करते और बातचीत करते पकड़े गए थे। इस मामले में भी बाद में झारखंड हाई कोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने कई विधायकों के ठिकानों पर छापेमारी की थी।
वर्ष 2012 का चुनाव- मार्च 2012 में झारखंड की 2 राज्यसभा सीटों के लिए वोटिंग होनी थी। चुनाव के दिन ही सुबह-सुबह रांची के पास एक गाड़ी से 2.15 करोड़ कैश बरामद हुआ। यह गाड़ी एक निर्दलीय उम्मीदवार के भाई की थी। आरोप लगा कि यह पैसा विधायकों को क्रॉस वोटिंग के लिए बांटने के लिए ले जाया जा रहा था।
वर्ष 2016 और 2018 के चुनाव: ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’ और एफआईआर
2016: भाजपा ने संख्याबल कम होने के बावजूद अपना दूसरा उम्मीदवार खड़ा किया और जीत हासिल की। विपक्ष ने आरोप लगाया कि सत्ता का दुरुपयोग कर कांग्रेस और झामुमो (JMM) के विधायकों से क्रॉस वोटिंग कराई गई। चुनाव के बाद विधायकों की खरीद-फरोख्त को लेकर पुलिस केस भी दर्ज हुए।
2018: इस चुनाव में भी भारी क्रॉस वोटिंग देखने को मिली, जहाँ प्रकाश जावड़ेकर (भाजपा प्रभारी) की रणनीति के चलते कांग्रेस के विधायकों ने पाला बदला और भाजपा उम्मीदवार की जीत हुई थी।
यह आंकड़े इतिहास बताते हैं, अगर भविष्य देखना हो तो इन आंकड़ों से तस्वीर साफ नजर आती है। अगर यही ट्रेंड रहा तो नाथवाणी की जीत लगभग तय है।
कितने काबिल हैं नाथवाणी
अब नाथवाणी को समझ लीजिए कौन हैं, परिमल नाथवाणी का जन्म 1 फरवरी 1956 को मुंबई में हुआ। वे रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड में डायरेक्टर, कॉर्पोरेट अफेयर्स के पद पर हैं और धीरूभाई अंबानी, मुकेश अंबानी के बेहद करीबी हैं। उन्होंने जामनगर, गुजरात में दुनिया की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी के लिए भूमि अधिग्रहण सहित कई बड़े काम कंपनी के लिए आसानी से किए हैं। नाथवाणी की राजनीति में मजबूत पकड़ है। उन्होंने मुंबई के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट से मैनेजमेंट में प्रोफेशनल डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की है।
राज्यसभा की राह
परिमल नाथवाणी तीन बार राज्यसभा जा चुके हैं। दो बार झारखंड ने इन्हें रास्ता दिया और तीसरी बार 2020 में आंध्र प्रदेशYSRCP (वाईएसआर कांग्रेस) ने। 2008 में जब नाथवाणी ने पहली बार झारखंड से चुनाव लड़ा था, तब वहाँ मधु कोड़ा की सरकार थी। 2020 में जगन मोहन रेड्डी की YSRCP पार्टी के टिकट पर आंध्र प्रदेश से राज्यसभा पहुँचे। उस समय मुकेश अंबानी खुद अमरावती पहुंचे थे जगन रेड्डी को मनाने।
कठिन था रास्ता पर परिमल नाथवामी को पता था जीत का मंत्र
यह सबसे चर्चित रहा क्योंकि आंध्र प्रदेश में कृष्णा गोदावरी बेसिन में प्राकृतिक गैस और तेल के लिए मुकेश अंबानी और उनके भाई अनिल अंबानी के बीच विवाद चल रहा था। वाईएसआर रेड्डी ने इस मामले में सरकार से मध्यस्थ की भूमिका निभाने की मांग की थी।जब अंबानी भाईयों के बीच का विवाद निपट गया तो वाईएसआर ने मांग की थी कि रिलायंस ग्रुप द्वारा जो गैस एक्सप्लोर की गई थी, उसमें से 10 प्रतिशत गैस उनके राज्य को कम दाम पर मिलनी चाहिए। आंध्र प्रदेश सरकार ने आंध्र प्रदेश गैस इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरपोरेशन का गठन किया था। साल 2009 में वाईएसआर का एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में निधन हो गया। इसके बाद आंध्र प्रदेश में रिलायंस को लेकर एक अलग छवि बनी लेकिन वाईएसआर रेड्डी के बेटे जगन मोहन रेड्डी ने परिमल नाथवाणी को उम्मीदवार बनाकर चौका दिया था।
क्यों नाथवानी को पड़ती है राज्यसभा की जरूरत
परिमल नाथवानी समेत कई उद्योगपति राज्यसभा की तरफ देखते हैं। आखिर क्यों राज्यसभा की जरूरत उद्योगपतियों को पड़ती है। इसके पीछे दो मूल वजह है। पहली तो यह है कि समाज में यह उनके प्रतिष्ठा से जुड़ा पद है उन्हें एक उद्योगपति के साथ- साथ यह पद एक सामाजिक व्यक्ति के रूप में भी स्थापित करने में मदद करता है।
दूसरी सबसे बड़ी वजह है, लॉबिंग और पॉलिसी पर नियंत्रण- सबसे बड़ा ‘लालच’ यह होता है कि वे देश के कानून और नीतियां बनाने वाली सर्वोच्च संस्था (संसद) के भीतर बैठते हैं। जब टैक्स (GST, कॉर्पोरेट टैक्स), आयात-निर्यात शुल्क, पर्यावरण नियम या माइनिंग से जुड़े कानून बनते हैं, तो वे अपनी इंडस्ट्री के अनुकूल नीतियों के लिए सरकार और मंत्रालयों पर असर डालते हैं। अधिकारियों और मंत्रियों तक सीधी पहुँच, सुरक्षा कवच और स्टेटस सिंबल: भारत में राजनीति को सबसे बड़ा ‘सुरक्षा कवच’ माना जाता है। सांसद बनने से उद्योगपतियों को एक खास तरह की कानूनी और राजनीतिक सुरक्षा मिलती है। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापारिक सौदे करते समय ‘मेम्बर ऑफ पार्लियामेंट’ का टैग उनकी साख को कई गुना बढ़ा देता है। दलों और उद्योगपतियों के बीच ‘गिव एंड टेक’ का रिश्ता – राजनीतिक दलों को भारी-भरकम चुनाव लड़ने के लिए ‘फंड’ की जरूरत होती है, जो उद्योगपति आसानी से दे सकते हैं। बदले में, पार्टियां अपने विधायकों के वोटों का इस्तेमाल कर इन उद्योगपतियों को बिना किसी जमीनी चुनाव (लोकसभा) की भागदौड़ के, पिछले दरवाजे (राज्यसभा) से संसद पहुंचा देती हैं।
आखिर कैसे होता है खेल
राज्यसभा चुनाव में विधायक जब किसी पार्टी से जुड़े हैं तो वह कैसे किसी दूसरे उम्मीदवार का चयन करते हैं। क्या उन्हें पार्टी से अलग होने, उन पर कार्रवाई होने, मतदाताओं के बीच उनकी साख खत्म हो जाने का डर नहीं रहता। इस सवाल के जवाब के लिए पहले चुनाव की पूरी प्रक्रिया को समझना होगा। सभी विधायक प्राथमिकता के आधार पर पहले , दूसरे और तीसरे स्तर पर उम्मीदवार का चयन करते हैं। उन्होंने जिसे पहले नंबर पर वोट दिया है उनका वोट उसी के लिए गिना जाता है लेकिन पहला उम्मीदवार अगर जीत गया तो फिर आंकड़े को पूरा करने के लिए दूसरे नंबर के चयन को जोड़ा जाता है। यह सब पूरी तरह निर्भर करता है कि सीट कितनी है, उम्मीदवार कितने है। जैसे झारखंड में अभी दो सीटें हैं और तीन उम्मीदवार है।
क्रॉस वोटिंग कैसे होती है
सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि यह प्रक्रिया गुप्त मतदान नहीं है। 2003 के संशोधन के बाद, राज्यसभा चुनावों में ओपन बैलट प्रणाली लागू है। वोट दिखाकर एमएलए को अपनी पार्टी के खिलाफ वोट डालने से रोकना।
नियम 39AA (आचरण नियम, 1961): इस नियम के तहत, हर पार्टी दो अधिकृत एजेंट नियुक्त कर सकती है। एजेंट का काम क्या है- एजेंट का काम यह सुनिश्चित करना होता है कि उसकी पार्टी के सभी विधायक वोट डालने से पहले अपना वोट दिखायें। अगर कोई विधायक अपना वोट एजेंट को नहीं दिखाता, या किसी और को दिखाता है, तो उसका वोट अमान्य हो जाता है।
अगर कोई पार्टी अपना एजेंट नियुक्त नहीं करती तो विधायकों को अपना वोट किसी को दिखाना नहीं पड़ता ऐसे में उनके पास किसी को भी वोट करने की आजादी होती है। इसके उदाहरण भी मौजूद हैं जम्मू-कश्मीर में 2025 में पीडीपी (PDP) ने कोई पोलिंग एजेंट नियुक्त नहीं किया था, जबकि कांग्रेस (जिसका भी कोई उम्मीदवार नहीं था) ने एक एजेंट रखा था। पीडीपी के विधायकों के वोटों पर कोई नजर नहीं थी। उनमें से कुछ ने भाजपा (BJP) उम्मीदवार को वोट दिया, जिससे सीधे 28 सदस्यों वाली भाजपा का उम्मीदवार 32 वोट लेकर जीत गयी। पीडीपी का तर्क था कि चूंकि उनका अपना उम्मीदवार नहीं था, इसलिए एजेंट रखना ज़रूरी नहीं है।
फैसले जिसने बदली राजनीतिक दिशा
कुलदीप नायर बनाम भारत संघ (2006) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग करने पर विधायक पर 10वीं अनुसूची के तहत तुरंत अयोग्यता की कार्रवाई नहीं होती। अगर कोई विधायक अपनी पार्टी के खिलाफ वोट डालता है (वोट दिखाने के बावजूद), तो उसे दल-बदल के तहत अयोग्य नहीं किया जा सकता। पार्टी आंतरिक तौर पर सजा देने, पार्टी से निष्कासित करने के लिए आजाद है लेकिन उसकी विधायकी नहीं जायेगी। इसके भी उदाहरण मौजूद है, हिमाचल प्रदेश 2024 में कांग्रेस के 6 विधायकों ने खुलेआम भाजपा के लिए वोट किया।
नियम की सीमा: एजेंट सिर्फ देख सकता है, रोक नहीं सकता। विधायक दिखाकर भी क्रॉस वोट कर सकता है।नियमों के तहत, बैलेट पेपर सिर्फ तब रद्द होता है जब विधायक अपनी पार्टी के एजेंट को बैलेट पेपर दिखाने से मना कर दे, या किसी दूसरी पार्टी के एजेंट को दिखा दे। अगर उसने अपनी ही पार्टी के एजेंट को दिखाकर दूसरी पार्टी को वोट दिया है, तो वह वोट बिल्कुल वैध माना जाता है और उसकी गिनती होती है।

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