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स्क्रीन के उस पार का सच: आपको बीमार कर रही है रील्स

स्क्रीन के उस पार का सच: आपको बीमार कर रही है रील्स

क्या आप सोशल मीडिया पर रील्स देखते हैं ? कितना देखते हैं ? क्या जब भी आप खाली बैठते हैं, आपके हाथ फोन पर चले जाते हैं ? सुबह आंख खुलते ही आपके हाथ फोन तलाशते हैं ? अगर इन सबके जवाब हां हैं, तो यह बेहद खतनाक है। आप एक ऐसी लत पाल रहे हैं जो आपको मानसिक, शारीरिक रूप से आपको बीमार कर रहे हैं। आपके सोचने, समझने की स्थिति पर असर पड़ रहा है।

क्यों है खतरनाक
रील्स जैसी फॉर्मेट खतरनाक मानी जाती है क्योंकि यह तुरंत डोपामिन रिवॉर्ड के डिज़ाइन सिद्धांत पर बनी है । अब सवाल है कि यह यह कितना खतरनाक है इसका कोई सीधा या सरल जवाब नहीं है। शुरूआत में यह बीमारी लगती ही नहीं, आप समझ ही नहीं पाते कि कैसे धीरे- धीरे आप इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। अगर सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताने की आदत है तो आप इस बीमारी की गिरफ्त में हैं। यह कोई सर्दी, जुकाम या कोई गंभीर बीमारी जैसे कैंसर या किडनी की समस्या नहीं है जो शरीर की तकलीफ से समझ में आये। इस बीमारी की सबसे बड़ी बात तो यह है कि आप मानते ही नहीं कि आप इसकी चपेट में हैं।

शराब और सिगरेट के तल की तरह है रील्स

फोन देखते रहना यह सिर्फ बुरी आदत नहीं है यह एक गंभीर मेडिकल समस्या है। भारत सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने इसे आधिकारिक तौर पर लत (behavioural addiction) माना है. ठीक वैसे ही जैसे शराब, सिगरेट या जुए की लत है। यह मानसिक तनाव और जीवन में रुकावट लाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ( WHO) ने भी डिसऑर्डर को ICD-11 में बीमारी की श्रेणी में रखा है। यानी फोन की लत यह अब टाइम पा” तक सीमित नहीं है यह इससे कहीं ज्यादा आगे बढ़ गई है। हैरान करने वाली बात तो यह है कि लगभग हर तीसरा भारतीय इस बीमारी का शिकार है। बस मसला यह है कि आप इस बीमारी के किस स्तर पर है।

क्या होता है असर

32% भारतीय यूज़र वैश्विक स्तर पर सबसे ज़्यादा “स्मार्टफोन एडिक्टेड” श्रेणी में आते हैं। यह बीमारी अभी इतनी खतरनाक नहीं है कि आपकी जान ले सके लेकिन यह आपके मानसिक स्वास्थ्य पर धीरे- धीरे असर डालताी है। हरियाणा में हुआ शोध बताता है कि आप जितनी ज्यादा रील्स देखते हैं ध्यान केंद्रित करने की क्षमता उतनी ही गिरती है। इसका असर आपकी पढ़ाई पर, करियर पर , आपके सोचने की शक्ति पर पड़ता है। क्लिनिक में आने वाले मरीज़ ज्यादार रोज़ 10-14 घंटे फोन पर बिताते हैं इसका परिणाम सामाजिक अलगाव, बीमारियां, परिवार टूटना, करियर बर्बाद होने के साथ- साथ यह खुद को नुकसान पहुंचाने के ख्याल आने लगते हैं ।

किशोर आ रहे हैं इस बीमारी की चपेट में

ज़्यादातर गंभीर मामले 14-19 साल के किशोरों में हैं। दिमाग के सबसे ज़्यादा विकसित होने की उम्र यही है औऱ पिछले 10 साल में इंटरनेट कनेक्शन 25 करोड़ से बढ़कर 97 करोड़ हो गए हैं। जैसे- जैसे इसकी संख्या बढ़ रही है बीमारी का दायरा बढ रहा है । फोन की लत आपके दिमाग पर तो असर डालती है लंबे समय तक एक जगह टिक कर बैठे रहने से, गर्दन झुकाकर फोन देखने से रीढ़ की हड्डी पर करीब 27 किलोग्राम तक का अतिरिक्त दबाव पड़ता है। एक शोध के मुताबिक, भारी स्मार्टफोन यूजर्स में 67.7% गर्दन के दर्द और 62.2% आंखों की समस्या है।

क्या आप हैं बीमार

ज्यादातर लोग फोन के बगैर रह ही नहीं पाते मानसिक स्थिति इस स्तर तक पहुंच गई है कि नेटवर्क न होने या बैटरी खत्म होने पर तेज घबराहट होने लगती है। करीब 47% लोग अपनी बैटरी 20% से नीचे जाने पर भारी तनाव में आ जाते हैं। जो इस लेख को पढ़ रहे हैं उनमें से कितने लोगों को यह लगता है कि उनका फोन बज रहा है या वाइब्रेट हो रहा है या कोई नोटिफिकेशन आया है , अगर आपको ऐसा लगता है तो आप वाइब्रेशन सिंड्रोम (Phantom Vibration Syndrome) से पीड़ित हैं इसमें व्यक्ति को बार-बार ऐसा भ्रम होता है कि उसकी जेब में रखा फोन वाइब्रेट कर रहा है या कोई नोटिफिकेशन आया है, जबकि असल में ऐसा कुछ नहीं होता। लगभग 73% वयस्क इस मानसिक भ्रम का शिकार हैं।

शोध क्या कहते हैं

एक विश्वविद्यालय के 150 छात्रों पर किए गए हालिया वैज्ञानिक अध्ययन (2025/2026) में यह देखा गया कि जो छात्र इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स या टिकटॉक पर ज्यादा समय बिताते थे, उनके ग्रेड्स (GPA) और परीक्षा के अंकों में 13% से 15% तक की भारी गिरावट दर्ज की गई। व जब वे पढ़ने बैठते, तो उनका दिमाग उसी तीव्र डोपामाइन की मांग करता जो रील्स से मिलता है। परिणामस्वरूप, वे किताबों पर 10 मिनट भी ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते थे। अमेरिका में एक शोध हुआ 4,000 से अधिक किशोरों पर हुए इस शोध में इस शोध में कुल चार साल का समय लगा जिन बच्चों पर शोध हुआ उनमें जिन बच्चों को फोन छीनने पर बेचैनी, बार-बार फोन देखने की बुरी लत थी उनके मन में आत्महत्या के विचार, भावनात्मक समस्याएं, मानसिक स्वास्थ्य संकट , पढ़ाई में खराब प्रदर्शन जैसे समस्या अधिक थी। इससे निर्णय लेने वाले हिस्सों की कार्य क्षमता प्रभावित होती है।

कैसे बचें

आप भी अगर इस बीमारी के शिकार हो रहे हैं तो इससे बचने के कुछ तरीके हैं।

1.स्क्रीन को ग्रेस्केल (Grayscale) करें: अपने फोन की सेटिंग्स में जाकर स्क्रीन को ब्लैक एंड व्हाइट (Grayscale) कर दीजिएष इससे रील्स के चमकीले रंग हमारे दिमाग को आकर्षित करते हैं स्क्रीन ब्लैक एंड व्हाइट रहेगी तो इसका असर कम होगा।
2.नो-फोन ज़ोन और टाइम तय करें: .सोने से ठीक 30 मिनट पहले और जागने के पहले 30 मिनट बाद तक फोन से बिल्कुल दूर रहिए।
3.एप टाइमर और सोशल मीडिया डिटॉक्स: फोन में में डिजिटल वेलबीइंग या स्क्रीन टाइम सेटिंग का उपयोग करके इंस्टाग्राम- यूट्यूब के लिए रोज़ाना 30 मिनट का कड़ा लॉक लगा दें। हफ्ते में एक दिन (जैसे रविवार) कम से कम 6 घंटे के लिए फोन को पूरी तरह बंद रखने का अभ्यास करें।
4.बोर होना जरूरी है : आपके पास खाली समय है और आप बोर हो रहे हैं बस शांत बैठें, दिमाग को शांत रहना सीखने दें। ज्यादा बोर हो रहे हैं तो किताबों की आदत डालें।

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