📅 Sunday, 19 July 2026
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पत्रकारिता क्या- क्या मांगती है ? बदले में देती क्या है

पत्रकारिता क्या- क्या मांगती है ? बदले में देती क्या है

पत्रकारिता बहुत कुछ मांगती है ? आप में से कोई बता सकता है हम इस पेशे में रहने की कीमत कैसे चुकाते हैं ? जब कोई युवा साथी हमें अचानक छोड़कर चले जाते हैं, तो आपके मन में सवाल नहीं उठता ? हम इसे पेशे के लिए क्या दे रहे हैं, कैसे दे रहे हैं, कितना दे रहे हैं ?

पत्रकारिता में इतना व्यस्त रहते हैं कि सही समय पर खाने का वक्त नहीं मिलता, कभी किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में मिली मिठाई की डिब्बी से कुछ खा लिये, तो कभी सड़क पर खड़े होकर एक प्याली चाय से भूख मार दी. घर से जो खाकर निकले वही फिर पता नहीं कि दोपहर और रात के खाने का क्या होगा ? कोई बड़ी खबर नहीं रही सबकुछ ठीक रहा, तो रात का खाना मिला वो भी किसी तय समय पर नहीं. 

ना सोने का वक्त सही, ना जागने का कोई निश्चित समय. भागते – दौड़ते हुए भी शरीर में कई तरह की बीमारियां. किसी को मधुमेह, तो किसी को कोई और परेशानी. इसके बाद भी पत्रकारिता में खुद को इतना झोंक देते हैं कि शरीर के संकेत समझ ही नहीं पाते. 

कई पत्रकारों को देखता हूं शाम में काम खत्म करने के बाद उनकी थकान मिठाने के तरीके अलग है. कई लोगों को शाम में हर दिन शराब चाहिए ही चाहिए.कहीं मिली तो ठीक नहीं मिली, तो एक छोटी बोतल खरीद कर कहीं भी, कैसे भी गटक ली कईयों को लगता है थकान मिट गयी लेकिन शरीर का क्या ? 

इन सबके बावजूद भी हमें मिलता क्या है ? कभी बड़ी खबर ब्रेक करने पर पत्रकार बिरादरी में ही वाहवाही, तारीफ. नेता से जान पहचान का गर्व. कभी किसी बड़े नेता ने पीठ थपथपा दी, तो लगता है जैसे सारे मेहनत का ईनाम मिल गया. संपादक ने तारीख कर दी, तो लगा सब सही है. किसी नयी संस्था या पुराने घाट ने कोई ईनाम दे दिया. एक चादर और सर्टिफिकेट की अच्छा काम कर रहे हो .आप कितने दिन याद रखे जायेंगे, सुबह जिस अखबार का महत्व होता है, शाम में लोग उसी में भूंजा फांकते हैं. 

सवाल है हमें चाहिए क्या ?  हमें अपनी मेहनत, अपनी काबिलियत और क्षमता के आधार पर पैसे चाहिए. समय पर चाहिए ताकि खबरों की परेशानी के साथ- साथ पत्रकार जो दो – तीन महीने वेतन ना मिलने का दर्द लिये घूमते हैं, यही जान लेवा है, इससे बच सकें.  

पत्रकार हित में संस्था बनाने वाले लोग, बड़े – बड़े वादे और दावे करने वाले लोग इस पर चुप रहेंगे क्योंकि कई बड़े लोग ही इन संस्थाओं के मुखिया है. युनियन बनाकर अपनी दुकान चला रहे हैं. अब सबसे जरूरी सवाल- करें क्या ?  बड़े- बड़े अफसर, कभी – कभी पूरी सरकार को अपनी खबरों से हिलाकर रख देने वाले अपने अंदर की कमियों को देखकर भी मौन रहते हैं.

 न्यूनतम मजदूरी पर रिसर्च करके बड़ा आर्टिकल लिखने वाले कई पत्रकारों का वेतन न्यूनतम मजदूरी से कम है. एक मजदूर दिनभर मेहनत करके 500 रुपये कमाता है कई पत्रकारों को इतना भी नहीं मिलता. जो खुद इतने शोषित है, वो करेंगे भी क्या. आप  अफसोस करिये. अपने बीच से किसी के इसी तरह चले जाने का, आप अफसोस कीजिए कि ब्याज की तरह आपकी शरीर में कई तरह की बीमारियां बढ़ रही है, आप अफसोस कीजिए कि किसी पत्रकार के बीमार होने पर आप 500 रुपये से ज्यादा की मदद नहीं कर सकते क्योंकि इससे ज्यादा देने पर आपके घर का बजट हिल जायेगा, आप बस अफसोस कीजिए…

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