
पांच दोस्त कुल 3 हजार किमी से अधिक की यात्रा और लगभग एक सप्ताह का समय । रोड ट्रिप का यह शानदार अनुभव जीवन के उन पन्नों में से है जिसे आप किसी के भी सामने एक शानदार याद के रूप में खोल सकते हैं। इस यात्रा की खास बात यह थी कि हमने सात दिनों में तीन या चार दिन होटल में बिताए बाकि रातें हमने गाड़ी में ही काटी, गाड़ी थी नयी वाली स्कॉर्पियो। इस यात्रा का एक समय तो ऐसा था जैसे लगा कि अब लौटना मुश्किल होगा। रात के 1 बजे के आसपास हम ऐसे घने जंगल में थे जहां हमारे साथ कोई नहीं था। पतली चढ़ाई, टूटी सीढ़ियां और तेज बारिश, थकान इतनी की थोड़ी देर सांस लेने रूके तो लगे कि यहीं नींद आ जायेगी। हिम्मत इतनी नहीं कि एक कदम भी चला जाए लेकिन हम पांच घने जंगल और अंधेरे में, तेज बारिश में पतली पन्नी की डेढ़ सौ रूपये वाली बरसाती और हाथ में डंडा लिए आगे बढ़ रहे थे ।

यात्रा का यह सबसे डरावना और सबसे यादगार पल था। सफर के इस पड़ाव तक पहुंचने के लिए हमारे साथ इस सफर पर चलना होगा। दफ्तर में कुछ दिनों की छुट्टी थी 13 जुलाई से यात्रा शुरू हुई। मैं इस यात्रा से पहले भी फैमिली ट्रिप पर था बोधगया, राजगीर होते हुए रांची लौटा और रास्ते से ही दोस्तों के साथ मेघालय ट्रिप के लिए निकल गया। शाम के 7 बजे के आसपास हम रांची से निकले और रात 8 बजे के आसपास हमारा पहला पड़ाव आया गुवाहाटी। हमने रात यहां बिताई 15 तारीख को हम सभी पहुंचे शिलांग
कैसा है शिलांग
शानदार शहर है, यहां के बाजार खाने और घूमने के लिए छोटे- छोटे मार्केट। सट्रीट पर म्यूजिक और यूथ की भीड़। हम यहां ज्यादा तो नहीं घूम सके यहां के कैफे कल्चर की खूब चर्चा सुनी थी तो डिलन्स कैफ़े ( Dylan’s Café) में कुछ घंटे बिताए, कॉफी पी, पिज्जा खाया। शाम को वापसी में जिस टैक्सी से अपने होटल वापस लौट रहे थे ड्राइवर से खूब बाचचीत की राजनीति, टूरिस्ट उनके अनुभव और जीवन के बारे में खूब अच्छी बात रही। उनके सफर को समझा कि कैसे वो किराये की टैक्सी से लेकर अब अपनी ट्रैक्सी तक का सफर तय कर पाये। परिवार में उनकी जिम्मेदारियां क्या है। उनके सबसे बेहतरीन और सबसे बुरे यात्री कौन से रहे।
रास्ते
रांची से लेकर सोहरा ( चेरापूंजी) का सफर इसलिए बेहद खास रहा क्योंकि रास्ते बेहद शानदार थे। हम जैसे ही गुवाहाटी से निकले पहाड़ों ने हमारा स्वागत करना शुरू कर दिया। सड़क के किनारे छोटी- छोटी दुकाने जिनमें तरह- तरह के अचार, ताजे फल और सब्जियां मिल रही थी। यहां से हमारी गाड़ी की रफ्तार धीमी होने लगी थी। हम रास्ते का आनंद लेते हुए ठहरते हुए, गाड़ी की सनरूफ से बाहर निकलकर हवाओं का आनंद लेते हुए चलने लगे थे। सबसे बेहतरीन रास्ता था शिलांग से चेरापूंजी ( सोहरा ) का। रास्ते में कई छोटी – छोटी नदियां, छोटे वाटरफॉल हम इसी का आनंद लेने गये थे लेकिन हम जुलाई के महीने में यहां थे और बारिश नहीं थी। मैंने बचपन में किताबों में पढ़ा था कि देश में सबसे ज्यादा बारिश यहां होती है। हम जब रांची से निकल रहे थे तो हमारे साथ बारिश थी लेकिन यहां बारिश नहीं थी मन थोड़ा दुखी तो था लेकिन बदलते मौसम का यह सबसे बड़ा सच था कि जलवायु परिवर्तन का असर इन जगहों पर भी दिखने लगा है।

बांग्लादेश की रौशनी
बांग्लादेश बोर्डर पर तफरीह
झारखंड की कोई सीमा सीधे बांग्लादेश से नहीं लगती हां संथाल परगना क्षेत्र (विशेषकर पाकुड़ और साहेबगंज जिले) पश्चिम बंगाल के रास्ते बांग्लादेश की सीमा के सबसे करीब (लगभग 40 से 50 किलोमीटर की दूरी पर)हैं। इससे पहले नेपाल की यात्रा पर हमने बारपाक से आगे जाकर चीन का बोर्डर समझने की कोशिश की थी। वहां से बोर्डर की दूरी लगभग 60 से 75 किलोमीटर की होगी लेकिन मेघालय की इस यात्रा में हम सोहरा के कई ग्रामीण इलाकों से होते हुए बोर्डर की फेनसिंग के ठीक पास वाली सड़क से गुजर रहे थे। हमें दूसरी तरफ, घर , खेत और लोग नजर आ रहे थे। हमने बहुत देर और दूर तक इन इलाकों में गाड़ी दौड़ाई। हमने दूर से बांग्लादेश में सामान लेकर प्रवेश करने वाले ट्रक की कतार भी देखी। बांग्लादेश के नजदीकी शहर देखे। भारत और बांग्लादेश को बांटती है वाह्रेव नदी (Wahrew River)। हमने नदी के किनारे सेना की चेकपोस्ट देखी, चेकपोस्ट के बाहर एक रस्सी थी जिसमें कपड़े सुख रहे थे। हमने यहां मौजूद सेना के जवान से लंबी बातचीत की। उन्होंने इशारे से दिखाया कि देखिए वो मछुआरा जो हमारे बिल्कुल नजदीक आ गया है बांग्लादेशी है। कई बार इसी तरह तैर कर नदी पार करने की कोशिश करते हैं जब पकड़ो तो कहते हैं मछलियां मारते हुए आ गये। हमें पता चला कि यहां दो जवान पहरा देते हैं । हमने आग्रह भी किया कि क्या हम यहां रात बिता सकते हैं सेना के जवान ने दिखाया कि उसके पास दो ही बिस्तर है। हम अगर दो भी होते तो रह सकते थे लेकिन हम पांच लोग थे। हम काफी देर वहां उनके साथ बैठे रहे।
गुफा और लापता रास्ते
मेरी किसी भी यात्रा की सबसे कमी या सबसे रोमांचक आदत है कि मैं कहीं भी जाने से पहले रिसर्च नहीं करता। मैं कभी भी पूरी प्लानिंग नहीं करता कि इन पांच दिनों की यात्रा में मैं यहां- यहां जाऊंगा। मैं वैसे ही चलता हूं जैसे रास्ते ले जाते हैं और मेरी यही आदत मुझे वो यादें देती है जो सबसे शानदार होती है। हमें घूमते – घूमते एक गुफा दिखी, अंदर प्रवेश करने के लिए 100 रुपये लगते लेकिन यहां इसे लेने वाला कोई नहीं था। बिल्कुल खाली, हमें पता चला कि शाम 5 बजे के बाद यह बंद हो जाता है। हम हैरान थे कि देखरेख करने वाला भी कोई नहीं है। हेलमेट रखे थे तो हम सभी ने हेलमेट उठाये और चल दिये गुफा के अंदर हमारे एक साथी अभिमन्यू जी ने समझदारी दिखाई और कहा कि मैं बाहर ठहरता हूं आपलोग अंदर जाइये। हम चार दोस्त गुफा के अंदर चले गये। बेहद खतरनाक रास्ता, फिसलन और पानी। गुफा के अंदर जाते वक्त तो पता नहीं चला लेकिन जब हमें लगा कि अब लौटना चाहिए तो देखा एक साथ कई रास्ते हैं, अंधेरा हो रहा है और रौशनी भी नहीं है किसी तरह मोबाइल के रास्ते हम चारों ने रास्ता तलाशा और बाहर निकले लेकिन वो एक घंटे की जो सही रास्ता तलाशने की कोशिश थी वो डराने वाली थी लेकिन किसे पता था कि हम जो आगे अनुभव करने वाले थे वो इससे कहीं ज्यादा डरावना और खतरनाक है।

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