
डुमरी के विधायक जयराम महतो का एक इंटरव्यू सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वीडियो में जयराम महतो अपना घर दिखा रहे हैं, श्मशान घाट की कहानी है, उनके गरीबी की , संघर्ष की कहानी है। कैसे परिवार चला, उनकी आर्थिक स्थिति कैसी रही। उनका संघर्ष कितना रहा वैगरह- वैगरह।
सवाल क्या हैं ?
अब कुछ लोग सवाल कर रहे हैं कि जयराम अपनी गरीबी बेच रहे हैं, लोगों के और करीब होने के लिए अपनी गरीबी औऱ संघर्ष को बेच रहे हैं। सवाल है कि कौन ये नहीं कर रहा। आप देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संघर्ष और बचपन से इसकी तुलना कर लीजिए। कौन नहीं जानता कि उनकी चाय की दुकान, उनका बचपन, उनकी मां और उनके संघर्ष के विषय में। राजनीति और सिखाती भी क्या है कि कैसे लोगों से एक ऐसा रिश्ता स्थापित किया जाए जिसमें जुड़ाव महसूस हो सके। इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि एमए की डिग्री मिलने के बाद ही घर में बिजली आई। चुनाव लड़ने के लिए गमछा बिछाकर चंदा इकट्ठा किया। विधानसभा में पहली बार नंगे पाँव गए। उन्होंने शपथ ली है कि जिले से बाहर एक इंच जमीन नहीं खरीदेंगे।
संघर्ष और सफलता की कहानी के साथ राजनीति
आप इस कहानी को देश की सबसे सफल राजनीतिक कहानी से जोड़ कर देख सकते हैं । भारतीय राजनीति में संघर्ष की कहानी का सबसे बड़ा और सबसे सफल उदाहरण खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। वडनगर रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने का किस्सा, माँ हीराबेन का संघर्ष, बचपन की गरीबी, संघ के प्रचारक के रूप में निकला घर से यह सब कहानियाँ आज भी मोदी जी के भाषणों, इंटरव्यू और प्रचार सामग्री का अभिन्न हिस्सा हैं। 2014 के चुनाव में “चाय पे चर्चा” अभियान ने इसी कहानी को देशव्यापी ब्रांड में बदल दिया। मोदी की माँ का साड़ी धोकर, बर्तन माँज कर घर चलाने की कहानी यह महज एक व्यक्तिगत स्मृति नहीं, एक सुनियोजित नैरेटिव है जो करोड़ों गरीब भारतीयों को यह एहसास दिलाता है।
कई नेताओं ने आम आदमी को बनाया हथियार
कोई राजनेता जब किसी गरीब परिवार के घर खाना खाता है, खाट पर बैठता है तो उससे यही अहसास कराता है कि वह उनके लिए कितना सहज रूप में उपलब्ध है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी एक बड़ा उदाहरण है उनके पास गरीबी और संघर्ष की कहानी नहीं है लेकिन उनके पिता और दादी के शहादत का इतिहास है, उन्होंने अपने जीवन में अपने पिता को बहुत पहले खो दिया, उनके पिता से जुड़ी यादें हैं। राहुल गांधी ने हमेशा अपनी राजनीति के केंद्र में गरीब, दलित, आदिवासी और पिछड़ो को रखा।
राहुल गांधी गरीब नहीं फिर
भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने आदिवासी परिवारों के घर रुककर खाना खाया, किसानों के साथ खेतों में बैठे, मजदूरों के साथ रात बिताई। यह भी उसी भावनात्मक जुड़ाव की रणनीति है। ममता बनर्जी, साड़ी, हवाई चप्पल और आम आदमी का चेहरा अरविंद केजरीवाल ने देश की राजनीति में ही कदम आम आदमी के कांधे पर उनके नाम पर रखा, लालू प्रसाद यादव कई कहानियां गाय चराने की कहानी, छात्रावास में मित्रों का खाना खाने की मजबूरी, बिना जूतों के पैदल चलना, नीतीश कुमार, योगी आदित्यनाथ और कई ऐसे नाम जिनकी कहानियों ने उनकी राजनीति की दिशा बदली और उनके संघर्ष की कहानियों ने ही उन्हें जनता से जुड़ने में मदद की ।
यूट्यूबर भी बेचते हैं अपनी गरीबी
जब इस देश की राजनीति के मूल में ही वही है फिर जयराम महतो के संघर्ष पर सवाल क्यों। सवाल सिर्फ जयराम महतो का नहीं है आप झारखंड के प्रचलित यूट्यूबर मनोज डे को देखिए आज भी इतने सफल होने के बाद वो अपने पुराने दिनों की बात करते हैं । ऐसे कई वीडियो उनके फीड पर आसानी से मिल जाएंगे। सवाल है कि ऐसा है क्यों तो संघर्ष की कहानियां बिकती हैं। हर कोई अपनी कहानी बताना चाहता है। अगर हम मोदी जी की चाय की दुकान को राजनीतिक जुड़ाव का प्रतीक मानते हैं, तो जयराम महतो का कच्चा मकान और श्मशान की पाठशाला भी उसी श्रेणी में आती है। अगर राहुल गांधी का आदिवासी झोपड़ी में रात बिताना “जनता से जुड़ाव” है, तो जयराम का अपना असली घर दिखाना “ढोंग” कैसे?
जब इतनी कहानियां देश की राजनीति को प्रेरित कर रही हैं फिर जयराम महतो से परेशानी क्यों हैं। जयराम महतो की राजनीति और उनके स्वभाव पर आप जितने भी सवाल खड़े कर लें यह एक ऐसा नेता है जिससे मिलना आसान है। जिसने विधानसभा में कई ऐसे मुद्दों पर अपनी आवाज बुलंद की जो आम लोग उठाना चाहते थे। जब विधानसभा में फर्निचर के पैसे बढ़ाने की मांग हुई तो जयराम ही वो थे जिन्होंने कहा कि विधायकों को और पैसा नहीं मिलना चाहिए। जयराम महतो से मिलना आसान है, उन तक अपनी बात पहुंचाना आसान है। आप किसी नेता से मिलने की मुलाकात की कोशिश करके देखिए कि आपको कितने स्तर की बातचीत और कहां – कहां करनी होगी। जयराम का संघर्ष सच में ऐसे लोगों को प्रेरित करता है जिनके पास चुनाव लड़ने का पैसा नहीं है, ना ही राजनीतिक पृष्टभूमि है, जयराम एक बड़े उदाहरण के रूप में मौजूद हैं।

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