
कॉक्रोच जनता पार्टी का भविष्य क्या है? क्या अभिजीत दीपके के नेतृत्व में युवाओं का यह आंदोलन आगे चलकर राजनीतिक पार्टी का रूप लेगा, या फिर यह आंदोलन देश की राजनीति और विपक्ष की कार्यशैली में बदलाव लाने का माध्यम बनेगा? अभिजीत दीपके का कहना है कि वे राजनीति में नहीं आना चाहते। लेकिन क्या किसी आंदोलन का राजनीतिक पार्टी में बदल जाना उसके मूल उद्देश्य की स्वाभाविक परिणति है?
याद कीजिए साल 2011। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के नेतृत्व में देशभर में आंदोलन चल रहा था। उस आंदोलन से जुड़े अरविंद केजरीवाल भी उस समय राजनीति में आने के पक्ष में नहीं थे। लेकिन आंदोलन के लगभग एक साल बाद आम आदमी पार्टी का गठन हुआ। केजरीवाल ने व्यवस्था को बाहर से चुनौती देने के बजाय चुनावी राजनीति में उतरकर उसे भीतर से बदलने का रास्ता चुना।
आज कॉक्रोच जनता पार्टी के सामने भी एक ऐसा ही सवाल खड़ा है। क्या व्यवस्था से लड़ने के लिए व्यवस्था का हिस्सा बनना जरूरी है? क्या सत्ता को चुनौती देने के लिए सत्ता हासिल करना आवश्यक है, या जनता को संगठित करके भी राजनीतिक बदलाव लाया जा सकता है?इन सवालों के जवाब तलाशने से पहले मौजूदा परिस्थितियों को समझना जरूरी है।
कमजोर विपक्ष और गैर-जवाबदेह सरकार का सवाल
लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका केवल सरकार का विरोध करना नहीं है। उसका काम सरकार के फैसलों की समीक्षा करना, जनता के सवाल उठाना, संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करना और वैकल्पिक नीतियों के जरिए लोकतांत्रिक विमर्श को मजबूत करना भी है।
कहा जाता है कि एक कमजोर विपक्ष, कमजोर या गैर-जवाबदेह सरकार से भी अधिक खतरनाक हो सकता है। जब सरकार के फैसलों पर प्रभावी सवाल नहीं उठते, जब संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर पर्याप्त चर्चा नहीं होती और जब जनता की शिकायतों को राजनीतिक प्राथमिकता नहीं मिलती, तब लोकतांत्रिक व्यवस्था में जवाबदेही का संकट पैदा हो सकता है।
लेकिन क्या आज भारतीय विपक्ष अपनी इस भूमिका को प्रभावी ढंग से निभा रहा है? क्या विपक्ष जनता के मुद्दों को लगातार उठाने, उन्हें व्यापक जनसमर्थन से जोड़ने और किसी ठोस परिणाम तक पहुंचाने में सक्षम है? यह सवाल केवल राहुल गांधी या किसी एक विपक्षी नेता की क्षमता का नहीं है। यह पूरे विपक्ष की राजनीतिक रणनीति, संगठनात्मक मजबूती और जनसरोकारों से जुड़ाव का सवाल है।
अगर विपक्ष पहले से मौजूद है, उसके पास राजनीतिक दल हैं, नेता हैं और संसद से लेकर सड़क तक अपनी बात रखने के मंच हैं, तो फिर कॉक्रोच जनता पार्टी जैसे नए आंदोलनों की जरूरत क्यों पड़ रही है?
इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे घटनाक्रम को समझना होगा।
जंतर-मंतर पर कॉक्रोच जनता पार्टी, आखिर क्यों उठा इस्तीफे का सवाल?
दिल्ली में कॉक्रोच जनता पार्टी एक बार फिर आंदोलन के जरिए अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है। युवाओं का एक वर्ग मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहा है। इस आंदोलन को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों और संगठनों के अपने-अपने तर्क हैं।
इससे पहले धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर भी विरोध की राजनीति चर्चा में रही थी। अब मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ उठ रही मांग ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची के संशोधन और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर बहस को तेज कर दिया है।

आंदोलन में कॉक्रोच जनता पार्टी के अलावा कांग्रेस और आम आदमी पार्टी सहित अन्य विपक्षी दलों की भागीदारी या समर्थन भी चर्चा का विषय है। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठे सवालों का जवाब दिया जाए और मुख्य चुनाव आयुक्त की जवाबदेही सुनिश्चित हो।दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी और उसके नेताओं ने विपक्ष के विरोध को राजनीतिक अभियान बताते हुए उसकी मंशा पर सवाल उठाए हैं। दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क दे रहे हैं।
ऐसे में किसी एक पक्ष के दावे को अंतिम सत्य मान लेने के बजाय यह समझना जरूरी है कि विवाद की शुरुआत कहां से हुई, चुनाव आयोग के भीतर किन सवालों को उठाया गया और कानून इस मामले में क्या कहता है।
14 आपत्तियों की रिपोर्ट ने क्यों बढ़ाई बहस?
23 सितंबर 2026 को The Indian Express में वरिष्ठ पत्रकार रितिका चोपड़ा की एक खोजी रिपोर्ट प्रकाशित हुई। इसके बाद 24 सितंबर को इस विषय पर विस्तृत रिपोर्टिंग और प्रतिक्रियाएं सामने आईं।
रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में निर्वाचन आयोग की विभिन्न कार्यवाहियों और निर्णयों को लेकर कम से कम 14 बार आधिकारिक रूप से आपत्तियां दर्ज की थीं। इन आपत्तियों में निर्णय लेने की प्रक्रिया, मतदाता सूची के संशोधन और आयोग के तकनीकी तंत्र के संचालन से जुड़े सवाल शामिल थे। रिपोर्ट में यह भी आरोप सामने आया कि कुछ महत्वपूर्ण निर्णय दोनों आयुक्तों की जानकारी या सहमति के बिना आगे बढ़ाए गए।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझनी चाहिए। रिपोर्ट में दर्ज आपत्तियां निर्वाचन आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठाती हैं, लेकिन वे अपने आप में चुनावी गड़बड़ी या किसी अवैध कार्रवाई का अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं हैं। इन आरोपों और उनके जवाबों का स्वतंत्र मूल्यांकन आवश्यक है।
विवाद का एक प्रमुख केंद्र विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) की प्रक्रिया रही है। बिहार से जून 2025 में शुरू हुई इस प्रक्रिया के बाद मतदाता सूचियों में व्यापक बदलाव हुए। The Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की प्रारूप मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए थे। यह आंकड़ा प्रारूप सूचियों में हटाए गए नामों का है; इसे अंतिम रूप से हटाए गए पात्र मतदाताओं की संख्या समझना उचित नहीं होगा।
मतदाता सूची का संशोधन किसी भी लोकतंत्र में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रक्रिया है। मृत मतदाताओं, स्थान बदल चुके लोगों और दोहराव वाली प्रविष्टियों को हटाना जरूरी हो सकता है। लेकिन इसी के साथ यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि कोई पात्र नागरिक मताधिकार से वंचित न हो जाए।
यही वह बिंदु है जहां SIR की प्रक्रिया की पारदर्शिता, आपत्तियों के निपटारे और मतदाताओं के अधिकारों को लेकर बहस महत्वपूर्ण हो जाती है।
फॉर्म-6 और मतदाता डेटाबेस पर विवाद क्या है?
रिपोर्ट में उठाए गए सवालों में फॉर्म-6 में बदलाव और मतदाता डेटाबेस के प्रबंधन का विषय भी शामिल था।फॉर्म-6 का इस्तेमाल नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए किया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने फॉर्म में बदलाव की प्रक्रिया पर सवाल उठाए और आशंका जताई कि निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए बिना बदलाव करना अनधिकृत या अवैध हो सकता है।
इसके अलावा, मतदाता डेटाबेस और आईटी प्रणाली के नियंत्रण को लेकर भी चिंताएं सामने आईं। सवाल यह था कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने जैसे वैधानिक कार्यों के लिए जिम्मेदार स्थानीय अधिकारियों को तकनीकी प्रणाली के माध्यम से पर्याप्त अधिकार और स्वतंत्रता मिल रही है या नहीं।
इन सवालों का महत्व इसलिए भी है क्योंकि चुनावी प्रक्रिया केवल मतदान के दिन तक सीमित नहीं होती। मतदाता सूची की तैयारी से लेकर नामों के संशोधन, आपत्तियों की सुनवाई और अंतिम सूची प्रकाशित करने तक प्रत्येक चरण में पारदर्शिता आवश्यक है।
निर्वाचन आयोग ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि आयोग के भीतर अलग-अलग विचार निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं और पिछले एक वर्ष के निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए। आयोग ने आपत्तियों को सुझावों और विचार-विमर्श की प्रक्रिया के संदर्भ में रखा।
इस प्रकार एक ओर आयोग का आधिकारिक पक्ष है, तो दूसरी ओर उसकी आंतरिक निर्णय प्रक्रिया को लेकर दर्ज आपत्तियां हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में इन दोनों को समझना और तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष निकालना जरूरी है।
स्रोत: निर्वाचन आयोग की प्रतिक्रिया पर The Indian Express की रिपोर्ट
क्या मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग जायज है?
रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तेज कर दी। आंदोलन और राजनीतिक बयानबाजी के बीच यह सवाल केंद्र में आ गया कि क्या इन परिस्थितियों में मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की मांग उचित है?
इस सवाल का जवाब केवल राजनीतिक आरोपों या समर्थन के आधार पर नहीं दिया जा सकता। इसके लिए संविधान, नियुक्ति की प्रक्रिया, पद की स्वतंत्रता और हटाने से संबंधित कानूनी प्रावधानों को समझना होगा।
यहां दो अलग-अलग बातों के बीच अंतर करना जरूरी है। पहली, किसी पदाधिकारी के फैसलों या कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना। दूसरी, उन सवालों के आधार पर उसे पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया शुरू करना। किसी भी संवैधानिक पदाधिकारी की जवाबदेही महत्वपूर्ण है। लेकिन उसी के साथ यह भी जरूरी है कि पदाधिकारी की स्वतंत्रता राजनीतिक दबाव से सुरक्षित रहे। यदि केवल राजनीतिक असहमति के आधार पर किसी संवैधानिक पदाधिकारी को हटाया जा सके, तो उसकी स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, यदि गंभीर प्रक्रियागत सवालों की जांच और जवाबदेही का कोई प्रभावी रास्ता न हो, तो संस्थागत विश्वास कमजोर पड़ सकता है।
इसलिए बहस केवल इस्तीफे की मांग तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। असली सवाल यह है कि उठाई गई आपत्तियों की जांच कैसे हो, निर्णय प्रक्रिया कितनी पारदर्शी हो और चुनाव आयोग पर जनता का विश्वास कैसे कायम रखा जाए।
मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति कैसे होती है?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 में निर्वाचन आयोग का प्रावधान है। इसके अंतर्गत संसद, राज्य विधानसभाओं तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग को दी गई है।
निर्वाचन आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त होते हैं। उनकी नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं, लेकिन नियुक्ति की प्रक्रिया कानून के तहत निर्धारित है। वर्तमान व्यवस्था को समझने के लिए वर्ष 2023 में बने कानून को देखना जरूरी है। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा की शर्तों और कार्यकाल को लेकर संसद ने Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023 पारित किया।
इस कानून के तहत नियुक्ति के लिए तीन सदस्यीय चयन समिति का प्रावधान है। इसमें प्रधानमंत्री अध्यक्ष होते हैं, प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री सदस्य होते हैं और लोकसभा में विपक्ष के नेता सदस्य होते हैं। चयन समिति संभावित उम्मीदवारों पर विचार करती है और नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति को सिफारिश भेजती है। इसके बाद राष्ट्रपति नियुक्ति करते हैं।
यहां एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है। जब चयन समिति में प्रधानमंत्री और उनके द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री, दोनों सरकार से जुड़े होते हैं, तो क्या विपक्ष के नेता की भागीदारी पर्याप्त संतुलन सुनिश्चित करती है? विपक्ष ने इसी संरचना पर सवाल उठाए हैं।
वहीं, सरकार की ओर से यह व्यवस्था संसद द्वारा बनाए गए कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया के रूप में लागू की गई है। इस बहस का मूल प्रश्न यह है कि संवैधानिक संस्था की स्वतंत्रता और नियुक्ति प्रक्रिया में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए कौन-सा संस्थागत ढांचा सबसे प्रभावी हो सकता है।
2023 से पहले नियुक्ति की प्रक्रिया क्या थी?
वर्ष 2023 के कानून से पहले संविधान में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए किसी विस्तृत वैधानिक चयन समिति का प्रावधान नहीं था। व्यवहार में केंद्र सरकार नियुक्ति के लिए नाम आगे बढ़ाती थी और राष्ट्रपति नियुक्ति करते थे।
इससे पहले, 2 मार्च 2023 को Anoop Baranwal v. Union of India मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया था। न्यायालय ने कहा था कि संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की समिति की सलाह के आधार पर की जानी चाहिए।
बाद में संसद ने 2023 का कानून बनाया, जिसमें मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को चयन समिति में सदस्य बनाया गया।
यही बदलाव नियुक्ति प्रक्रिया पर राजनीतिक और संवैधानिक बहस का एक प्रमुख आधार बना है। आलोचकों का कहना है कि इससे चयन समिति में सरकार का प्रभाव बढ़ता है। इस पर अंतिम निष्कर्ष निकालने के लिए कानून के प्रावधानों, न्यायिक समीक्षा और संस्थागत स्वतंत्रता से जुड़े तर्कों को साथ रखकर देखना आवश्यक है।
स्रोत: सुप्रीम कोर्ट का Anoop Baranwal फैसला
ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति कैसे हुई?
ज्ञानेश कुमार सेवानिवृत्त भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी हैं। उन्होंने केंद्र सरकार में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया और सहकारिता मंत्रालय के सचिव भी रहे।
फरवरी 2025 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार का कार्यकाल समाप्त होने के बाद नए मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हुई। 17 फरवरी 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने ज्ञानेश कुमार के नाम पर विचार किया। समिति में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी भी शामिल थे।
समिति की सिफारिश के बाद राष्ट्रपति ने ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया। उन्होंने 19 फरवरी 2025 को पदभार संभाला।
नियुक्ति के समय भी चयन समिति की संरचना पर विपक्ष ने सवाल उठाए थे। राहुल गांधी ने असहमति जताते हुए कहा था कि समिति में सरकार से जुड़े दो सदस्यों के मुकाबले विपक्ष के नेता की भूमिका सीमित रह जाती है।
यह विवाद केवल किसी एक नियुक्ति तक सीमित नहीं है। यह इस बड़े सवाल से जुड़ा है कि निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के प्रमुख की नियुक्ति में सरकार, विपक्ष और अन्य स्वतंत्र संस्थाओं की भूमिका किस प्रकार निर्धारित होनी चाहिए।
अगर ज्ञानेश कुमार इस्तीफा देते हैं, तो क्या बदल जाएगा?
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल पर लौटते हैं। यदि ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दे देते हैं, तो क्या मौजूदा विवाद समाप्त हो जाएगा? क्या मतदाता सूची के संशोधन की प्रक्रिया पर उठे सवालों का जवाब मिल जाएगा? क्या निर्वाचन आयोग की निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित हो जाएगी?
इन सवालों का जवाब अपने आप में स्पष्ट है ,इस्तीफा किसी विवाद का राजनीतिक समाधान हो सकता है, लेकिन वह जरूरी नहीं कि संस्थागत समस्याओं का समाधान भी हो।
ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की स्थिति में पद रिक्त होगा और नए मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति लागू कानूनी प्रक्रिया के अनुसार करनी होगी। यदि नियुक्ति की वही व्यवस्था बनी रहती है, तो चयन समिति की संरचना को लेकर उठे सवाल भी बने रह सकते हैं।
इसलिए यह पूछना जरूरी है कि आंदोलन का उद्देश्य केवल किसी एक पदाधिकारी को हटाना है या उस व्यवस्था में सुधार लाना भी है जिसके अंतर्गत नियुक्तियां होती हैं और निर्णय लिए जाते हैं।
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद प्रल्हाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार सौंपे जाने का उदाहरण इस संदर्भ में याद किया जा सकता है। किसी मंत्री के पद छोड़ने के बाद जिम्मेदारी किसी अन्य व्यक्ति को सौंपी जा सकती है। लेकिन किसी संवैधानिक संस्था के मामले में सवाल केवल उत्तराधिकारी नियुक्त करने का नहीं, बल्कि संस्था की स्वतंत्रता, प्रक्रिया और विश्वसनीयता का भी होता है।
यदि मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे के बाद भी नियुक्ति प्रक्रिया, मतदाता सूची के संशोधन और निर्णयों की पारदर्शिता से जुड़े सवाल अनसुलझे रह जाते हैं, तो क्या आंदोलन का मूल उद्देश्य पूरा माना जाएगा?
इसलिए सवाल इस्तीफे का है या व्यवस्था में बदलाव का इस पर विचार करना आवश्यक है।
क्या कॉक्रोच करेंगे राजनीति में प्रवेश?
अब फिर उसी सवाल पर आते हैं, जिससे इस चर्चा की शुरुआत हुई थी। अभिजीत दीपके का कहना है कि वे राजनीति में नहीं आना चाहते। लेकिन किसी आंदोलन का भविष्य केवल उसके वर्तमान नेतृत्व की घोषणा से तय नहीं होता। यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि आंदोलन किन मुद्दों को उठाता है, जनता उससे किस हद तक जुड़ती है और वह अपने उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए कौन-सा रास्ता चुनता है।
भारतीय राजनीति में ऐसे उदाहरण मौजूद हैं, जहां सामाजिक आंदोलनों ने राजनीतिक दलों को जन्म दिया। अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से निकले राजनीतिक विमर्श ने आम आदमी पार्टी के गठन का रास्ता बनाया। आंदोलन से राजनीति में प्रवेश करने का निर्णय उस समय भी बहस का विषय था।
एक पक्ष का तर्क था कि व्यवस्था में बदलाव के लिए चुनावी राजनीति में उतरना जरूरी है। दूसरा पक्ष मानता था कि आंदोलन की स्वतंत्रता और नैतिक दबाव को बनाए रखना भी अपने आप में महत्वपूर्ण है।
कॉक्रोच जनता पार्टी के सामने भी भविष्य में ऐसे विकल्प हो सकते हैं। वह एक जनआंदोलन के रूप में अपनी भूमिका जारी रख सकती है, मौजूदा राजनीतिक दलों पर दबाव बना सकती है या भविष्य में चुनावी राजनीति में प्रवेश करने का फैसला कर सकती है।लेकिन इन संभावनाओं में से कौन-सा रास्ता चुना जाएगा, यह अभी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता।
आखिरकार, किसी आंदोलन की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि उसने राजनीतिक पार्टी बनाई या नहीं। यह भी देखना होगा कि उसने किन मुद्दों को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाया, कितनी जवाबदेही सुनिश्चित की और अपने उद्देश्यों की दिशा में क्या ठोस परिणाम हासिल किए।
क्या देश में विपक्ष कमजोर है? फिर नए आंदोलन की जरूरत क्यों?
यहां हमें विपक्ष को केवल संसद में बैठे दलों या विपक्ष के नेता तक सीमित करके नहीं देखना चाहिए। विपक्ष का व्यापक अर्थ है वे राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन, नागरिक समूह और जनआंदोलन जो सरकार के फैसलों पर सवाल उठाते हैं, वैकल्पिक विचार सामने रखते हैं और जनता के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर आवाज उठाते हैं।
यदि स्थापित राजनीतिक दल किसी मुद्दे पर जनता को प्रभावी ढंग से जोड़ने में सफल नहीं होते, तो नए आंदोलन के लिए जगह बन सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि मौजूदा विपक्ष पूरी तरह अप्रासंगिक हो गया है। इसका अर्थ यह भी नहीं कि नया आंदोलन अपने आप में अधिक प्रभावी साबित होगा।
यह इस बात पर निर्भर करता है कि कौन-सा संगठन किस मुद्दे को उठाता है, उसके पास क्या तथ्य हैं, वह जनता के सामने किस तरह अपना पक्ष रखता है और क्या वह विरोध को किसी ठोस संस्थागत या नीतिगत परिणाम में बदल पाता है।
वर्ष 2011 में अन्ना हजारे का आंदोलन इस बात का उदाहरण था कि कोई मुद्दा स्थापित राजनीतिक दलों से बाहर भी व्यापक जनसमर्थन हासिल कर सकता है। लेकिन उस आंदोलन से निकली राजनीति का मूल्यांकन अलग-अलग मानकों पर किया जा सकता है। आंदोलन, राजनीतिक दल और सरकार—तीनों की भूमिकाएं एक जैसी नहीं होतीं।
इसी तरह कॉक्रोच जनता पार्टी का मूल्यांकन भी उसके नाम, उसके विरोध प्रदर्शन या उसकी राजनीतिक संभावनाओं के आधार पर ही नहीं, बल्कि उसके मुद्दों, कार्यशैली और भविष्य के निर्णयों के आधार पर होना चाहिए।
लोकतंत्र में जरूरी है सवाल पूछना, लेकिन तथ्यों के साथ
इस पूरे घटनाक्रम में अलग-अलग राजनीतिक दलों के अपने तर्क हैं। कोई इसे लोकतंत्र और मताधिकार की रक्षा का आंदोलन बताता है, तो कोई इसे राजनीतिक लाभ के लिए चलाया जा रहा अभियान मानता है।
नागरिकों के लिए जरूरी है कि वे केवल अपने पसंदीदा राजनीतिक दल के दावों पर निर्भर न रहें। किसी भी विषय पर राय बनाने से पहले संबंधित पक्षों की दलीलें, उपलब्ध दस्तावेज, आधिकारिक प्रतिक्रियाएं और कानूनी प्रावधानों को समझना चाहिए।
मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ उठी मांग पर भी यही कसौटी लागू होती है। सवाल उठाना लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन सवालों के आधार पर निष्कर्ष निकालने के लिए प्रमाण, प्रक्रिया और जवाबदेही को महत्व देना भी उतना ही आवश्यक है।
यदि निर्वाचन आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठते हैं, तो उनका स्पष्ट जवाब सामने आना चाहिए। यदि मतदाता सूची में संशोधन से किसी पात्र मतदाता के अधिकार प्रभावित होने की आशंका है, तो शिकायतों के निपटारे की प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए। और यदि नियुक्ति प्रक्रिया की स्वतंत्रता को लेकर चिंता है, तो उस पर भी गंभीर संवैधानिक विमर्श होना चाहिए।
यह सब किसी एक राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध से आगे की बातें हैं। लोकतंत्र की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि संस्थाएं कितनी पारदर्शी हैं, नागरिकों के अधिकार कितने सुरक्षित हैं और सत्ता में बैठे लोगों से कितनी प्रभावी जवाबदेही मांगी जा सकती है।
आखिरकार, सत्ता से लड़ने के लिए सत्ता में आना जरूरी है या नहीं?
इस लेख की शुरुआत में हमने दो सवाल उठाए थे।
पहला—क्या सत्ता से लड़ने के लिए सत्ता में आना जरूरी है?
दूसरा—यदि देश में पहले से विपक्ष मौजूद है, तो फिर कॉक्रोच जनता पार्टी जैसे नए आंदोलन की जरूरत क्यों है?
इन दोनों सवालों का कोई एक सार्वभौमिक जवाब नहीं है। आंदोलन सत्ता के बाहर रहकर भी जनमत तैयार कर सकते हैं, सरकारों पर दबाव बना सकते हैं और नीतिगत बदलाव की मांग कर सकते हैं। वहीं, चुनावी राजनीति में प्रवेश करके कोई आंदोलन अपने विचारों को कानून, नीतियों और प्रशासनिक फैसलों में बदलने का प्रयास भी कर सकता है।
दोनों रास्तों की अपनी संभावनाएं हैं और अपनी चुनौतियां भी। आंदोलन के लिए जनता का विश्वास बनाए रखना महत्वपूर्ण है, जबकि राजनीतिक दल के लिए व्यापक जनसमर्थन के साथ-साथ शासन और जवाबदेही की जिम्मेदारी भी जुड़ जाती है।
कॉक्रोच जनता पार्टी आगे चलकर क्या करेगी, यह समय बताएगा। लेकिन उसका वर्तमान आंदोलन एक व्यापक सवाल जरूर सामने रखता है? क्या स्थापित राजनीतिक दल जनता के मुद्दों को पर्याप्त प्रभावी ढंग से उठा पा रहे हैं, और क्या लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए मौजूदा व्यवस्थाएं पर्याप्त हैं? ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा हो या न हो, चुनाव आयोग के भीतर उठे सवालों का जवाब, नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता और मतदाता सूची की विश्वसनीयता जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण बने रहेंगे।यह भी देखना होगा कि वह जनता को कितना जागरूक करता है, लोकतांत्रिक संस्थाओं को कितना जवाबदेह बनाता है और अपने मूल उद्देश्यों को हासिल करने के लिए किस दिशा में आगे बढ़ता है।इसलिए किसी एक पक्ष के साथ खड़े होने से पहले दूसरे पक्ष की दलीलों को भी समझिए। किसी राजनीतिक दल, आंदोलन या नेता का समर्थन कीजिए, लेकिन तथ्यों को जाने बिना नहीं।
क्योंकि लोकतंत्र में केवल सत्ता बदलना ही सवाल नहीं है। सवाल यह भी है कि सत्ता और संस्थाओं के काम करने का तरीका कितना बदलता है।

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